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Dharm, Rashtra Aur Rajniti

  • पेपरबैक, हार्डबैक
  • प्रकाशन वर्ष 2021
  • ISBN 978-93-89191-84-4
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किताब के बारे में

सच तो यह है कि धर्म को गाली देना हमारे यहां बुद्धिमता और धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक बन चुका है । अब चूंकि किसी अन्य धर्म के खिलाफ विशेषकर इस्लाम धर्म के खिलाफ बोलने का कोई साहस करना नहीं चाहता इसलिए हिन्दुत्व को चोट पहुंचा बुद्धिजीवी कहलाना सबसे आसान हैं तसलीमा नसरीन, सलमान रुश्ती या आज हुसैन बनने का साहस किसी में है नहीं । वैसे भी सेक्यूलर कहलाने का शौक रखने वाले जानते हैं कि यह दर्जा केवल राम को अमर्यादित पुरुष कहने से अथवा कृष्ण को लंपट कहने से मिलता है । पैगम्बर पर टीका–टिप्पणी करने से हिन्दुवादी कहलाए जाने का खतरा तो है ही, जान का खतरा भी तय है । इस अति उन्मादी सेक्यूलरवादी मानसिकता से मुझे गंभीर मतभेद हैं । आप धर्म के नाम पर चल रहे आडंबर के घोर विरोधी हैं या आप धर्म को स्वीकारते ही नहीं हैं तो यह आपका नितांत निजी मामला है । आप स्वतंत्र हैं यह घोषित करने के लिए कि आप नास्तिक हैं । आप को यह पूरा अधिकार है कि मंदिर, मस्जिद अथवा चर्च–गुरुद्वारे के पास भी ना फटके । लेकिन यह अधिकार आपको कतई नहीं है कि अपने विचारों को जबरन थोपने का प्रयास करे या अपने विचारों को दूसरों पर उत्तेजक बना करोड़ों की आस्था से खिलवाड़ करें । -इसी पुस्तक से यह पुस्तक उनके साप्ताहिक अख़्ाबार ‘दि संडे पोस्ट’ में पिछले कुछ वर्षों में लिखे चुनिंदा सम्पादकीय लेखों का संकलन है । अलग–अलग वक्त में लिखे इन सम्पादकीय में गजब का तालमेल है । हर सम्पादकीय एक मुकम्मल लेख की तरह बन पड़ा है । अपूर्व किसी मुद्दे को सतही तौर पर कभी नहीं उठते हैं । साहस और आत्मविश्वास के साथ हर एक मुद्दों पर अपने विचार रखते हैं । अपूर्व की वैचारिक दृढ़ता से कोई भी आकर्षित हो सकता है । धर्म और राजनीति का गठजोड़ काफी पुराना रहा है । मजे की बात यह है कि इन दोनों में ‘चोली–दामन’ जैसा साथ भी रहा है । कभी राजनीति के जरिये धर्म का घनघोर इस्तेमाल किया जाता है, कभी धर्म के नाम पर राजनीति की अंगीठी पर ‘वोट’ की रोटी सेंकी जाती रही है । इस गठजोड़ को अपूर्व बखूबी समझते हैं । इस कारण वे किसी भी रूप में समझौता करने को राजी नहीं होते हैं बल्कि सख़्ती से ‘नपाई’ कर देते हैं । यदा–कदा उनकी मुखालिफत इतना जोरदार होता है कि कुछ लोग उन्हें गलत समझ बैठते हैं । उन्हीं कुछ लोगों को लगता है कि अपूर्व ने अपना कोई पुराना हिसाब–किताब चुकता किया है जबकि उन्हें जानने वाले जानते हैं कि वे किसी खास उद्देश्य को साधने के लिए कभी नहीं लिखते हैं । उनका पक्ष और विपक्ष कभी रहस्यमयी नहीं रहा है । -पंकज शर्मा

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