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Jab Aawegi Kaal Gatha
प्रस्तुत उपन्यास लिखते समय मेरे सामने तीन दृष्टिकोण थे। एक-मुझे नाथसंप्रदाय का यह रूप दिखाना था जो गोरखनाथ और कबीर के बीच में था। इसमें गोरखनाथी संप्रदाय का विस्तृत रूप और साधनाएँ आई। दो-तत्कालीन युग का चित्रण करके योगियों की परिस्थिति दिखानी थी। इसमें विदेशियों की वास्तविकता और इस्लाम को प्रगट करना पड़ा। तीन-सिद्धियों वाले योगियों का जनता में प्रभाव, उससे संबंध, जीवित बने रहने का कारण, रूप बदलने का कारण तथा सांस्कृतिक परंपरा को निर्वाह करने का कारण दिखाना था। इसमें हिंदी साहित्य को नाथसंप्रदाय की देन दिखानी पड़ी। इन तीनों का निर्वाह कर दिया और इसलिए बहुत बड़े पट को अंकित करना पड़ा, जिसके लिए शैली भी नयी अपनानी पड़ी। इस दृष्टिकोण से चरित्र चित्रण में यह प्रयत्न अभी तक नया है। चर्पटनाथ को मैंने ज्ञानेश्वर और उनके बाद तक माना है। बहुधा चर्पट को गोरख का समकालीन माना जाता है। किंतु मैं इस परंपरा को नहीं मानता। मेरी राय में चर्पटी और चर्पट दो व्यक्ति थे। चर्पटी थे पा संप्रदाय के और थे पुराने व्यक्ति । चर्पटनाथ थे परवर्ती। बाद में दोनों मिला दिये गये। सिद्ध और नाथ बाद में बहुधा मिला दिये गये है। जो चर्पटी पा थे वे सम्भवतः गोरख युगीन थे, या कुछ बाद में, उनमें शाक्त प्रभाव रहा होगा, वज्रयानी भी। चर्पटनाथ रसेश्वर मत के थे। चर्पटनाथ का कार्य-विवरण नहीं मिलता उनकी रचनाएँ मिलती हैं, जिनकी भाषा सधुक्कड़ी है और भाव दृष्टि से भी वे गोरख के बहुत बाद की लगती हैं। चर्पट ने योगी के बाह्यवेश को ही अस्वीकृत किया है, जो प्रकट करता है कि वे गोरख से काफी दूर थे, क्योंकि गोरख के युग में योगी वेश धारण करना ब्रह्मचर्य के कारण गौरवास्पद विषय था।
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