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Shyamaswapna
प्रियतम ! तुम मेरी नूतन और प्राचीन दशा को भली-भांति जानते ही मेरा तुमसे कुछ भी नहीं छिपा तो इसके पढ़ने, सुनने और जानने के पात्र तुम ही हो तुम नहीं तो और कौन होगा? कोई नहीं। श्यामालता के वेत्ता तो आप हो न? यह उसी सम्बन्ध का श्यामास्वप्न भी बनाकर प्रकट करता हूँ। रात्रि के चार प्रहर होते हैं-इस स्वप्न में भी चार प्रहर के चार स्वप्न हैं। जगत् स्वप्नवत् हैं-तो यह भी स्वप्न ही है। मेरे लेख तो प्रत्यक्ष भी स्वप्न हैं-पर मेरा श्यामास्वप्न स्वप्न ही है। अधिक कहने का अवसर नहीं। प्रेमपात्र ! तुम इसके भी पात्र हो। मेरी तुम्हारी प्रीति की सचाई और दृढ़ता का ब्यौरा तुमही करोगे। यहाँ कोई निर्णय करने वाला नहीं। यह मेरी प्रथम गद्यरचना है, क्या इसे अंगीकार न करोगे? तुम्हारा 'मोती मंगल' और यह मेरा 'श्यामास्वप्न' हम दोनों के जीवनचरित की सरिताकल्लोल का चक्रवाक-मिथुन का हंस जोड़ा आजीवान्त कल्लोल करेगा। जिसके सरस तीर के निकुन्जमण्डप पर 'श्यामालता' सदा लहलहाती रहैगी-जिस कुंज के 'प्रेससम्पत्ति' और 'श्यामासरोजिनी' रूपी विहंगम सदा चहक चहककर 'श्यामालता' की शोभा बढ़ावेंगे- 'श्यामसुन्दर' चातक सदा प्यासे ही बनकर 'पी पी' रटेंगे 'मकरन्द' कोकिल सदा हितके मीठे बोल बोलेंगे और दुर्जन द्विरेफ दारुण झंकार के मचाने में कभी न चूकेंगे-यह अपूर्व सरिता की धारा कभी न रुकेगी- अन्त को प्रेमब्रह्मा के कमण्डलु में समाकर हम दोनों को दैहिक दुःख और संसार के बन्धन से मुक्त करेगी, अब दिन आ रहे हैं। ज्ञान का दीप भ्रमतिमिर का नाश करेगा और प्रतिदिन मार्ग सुगम होता जाएगा। चिन्ता नहीं, इस संसार में तुम्हें छोड़ और कोई मेरा सर्वस्व नहीं-तुम्हारा ही कहा करता हूँ।
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