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Rajeev Prakash Sahir
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Rajeev Prakash Sahir

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हिन्दुस्तानी ज़बान का एक लेखक हूँ। हिन्दुस्तानी ज़बान यानी हिंदी उर्दू का गंगा जमनी संगम। मैं हिन्दुस्तानी ज़बान के दोनों रंगों में रंगा हुआ हूँ। यानी देवनागरी लिपि में भी पढ़ता लिखता हूँ और उर्दू रस्मुल ख़त से भी खूब वाक्रिफ़ हूँ। मैं पैदाइशी लखनवी हूँ यानी मेरा जन्म स्थान लखनऊ है। लखनऊ, गंगा जमनी तहज़ीब का मरकज़, लखनऊ जिसकी फ़ज़ाओं में उर्दू की कशिश रची बसी है और उर्दू की नफ़ासत, शीरनी, आदाबो अदब जिसकी रूह की ज़ीनत है। लखनऊ जहाँ एक सुनहरा गुज़रा ज़माना उर्दू का अब भी सांस ले रहा है और जहाँ उर्दू आज भी अपने अतीत का आहंग लिए जदीदयत (आधुनिकता) में परवान चढ़ रही है, जी हाँ, वही लखनऊ मेरी रग रग में बसा हुआ है।

लखनऊ युनिवर्सिटी से राजनैतिक शास्त्र से एम. ए. किया और फिर ज़िंदगी के संग्राम और संघर्ष का हिस्सा बन गया। औसत पढ़े लिखे परिवार का जन्मा हूँ और इसलिए धूप छांव की आमेजिश से अनजान भी नहीं हूँ।

साहित्यिक जीवन का आगाज़ उर्दू शायरी से हुआ। पहला शेरी मजमूआ "तारूफ़" 2014 में मंज़रेआम पर आया। ज़िंदगी को क़रीब से देखने का मौक़ा खूब मिला और अधिकतर इस के चेहरे ने रूलाया ही है। जिंदगी और अफ़सानों, कहानियों का आपसी रिश्ता क़रीबी है। ज़िदंगी के बगैर अफ़साने नहीं और इन के बगैर ज़िंदगी नहीं।

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