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Aatmao Ke Sarab
राजीव प्रकाश सहिर के नावेल आत्माओं के सराब पढ़ने के बाद मुझे फौरी तौर पर जो एहसास हुआ वह यह था कि यह कोई आम नावेल नहीं है। यह एक बहुत अहम नावेल है जिसमें एक मखसूस तारीखी शुऊर और अहदे हाजिर का इन्तेहाई फ़नकाराना मिलाप सामने आता है। उत्तराखंड और अवध की तहजीब नीज उसके एक गुमशुदा और नादीदा रिश्ते को राजीव प्रकाश साहब ने जिस तख़लीक्ती जेहानत और उम्दगी के साथ उजागर किया है वह अपनी मिसाल आप है। प्लाट, किरदार निगारी और मंजर निगारी के हवाले से भी यह नॉवेल याद रखे जाने के क़ाबिल है और इस पर खैर मुझे कोई हैरत भी नहीं है, क्योंकि इस नॉवेल से पहले मैं उनके अफसाने पढ़ चुका हूं और फिक्शन लिखने पर उनकी कुदरत और गिरफ्त का क़ायल हो चुका हूं। इस नावेल को महौलियात की शेरियात के ताल्लुक्क से बहुत अहम माना जा सकता है। मुझे बार बार इस नावेल को पढ़ते वक्त 'रूसो' का यह कौल याद आता रहा है कि जंगलों की तरफ लौट चलो Back to forest मगर जहां 'रूसो' का नजरिया फ़ितरत के हवाले से इन्तेहा पसन्द हद तक 'रूमानी' कहा जा सकता है वहां यह नावेल इस इन्तेहा पसन्द रूमानी रवैये से अपना दामन कमाल महारत के साथ साफ़ बचा ले जाता है। आत्माओं के सराब से यही मतलब अख्त किया जाना चाहिए कि आत्मा जिसे हम शुऊर या चेतना भी कह सकते हैं वह किस तरह ठगी जाती है। हिंदुस्तानी फलसफे में जिसे 'माया' कहा जाता है वह हमेशा 'आत्म' के लिए एक सराब है या Illusion ही बनकर सामने आती है। इस नावेल के बेशतर किरदारों के शऊर की यही सूरते हाल है कि वह सियासत या मजहबी सियासत के मायाजाल से हमेशा ठगे जाते और शिकस्त खाते हुए नजर आते हैं। गोमती नदी के जरिए महेज अवध की तहजीब के तारीखी और सकाफ़ती अनासिर की नुमाइन्दगी ही मक्तसूद नहीं थी बल्कि नदी बदलते हुए वक़्त की नुमाइन्दगी भी करती है। नदी बह रही है, वक़्त बह रहा है, तारीख बह रही है और माजी हमेशा एक सराब साबित होता है क्योंकि बक्तौल यूनानी फ़लसफ़ी Heraculus 'तुम एक हो नदी में दो बार नहीं नहा सकते'। मेरा ख्याल है कि नावेल में जंगल का जिस अंदाज में बयान किया गया है वह महेज फ़ितरत की अक्कासी नहीं है बल्कि जंगल को अदम का इसतेआरा बनने के इमकान को भी मद्देनजर रखना चाहिए जहां सब कुछ बिल आखिर गुम हो जाता है।
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