
लेखक
Saudat Hasan Manto
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सआदत हसन मंटो
जन्म : 11 मई, 1912 को लुधियाना (पंजाब) के क़स्बा समराला के एक कश्मीरी परिवार में। उनके पिता गुलाम हसन नामी वैरिस्टर और सेशन जज थे।
शिक्षा : मुस्लिम हाई स्कूल अमृतसर, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी। मंटो कहानीकार के साथ-साथ फिल्म और रेडियो पटकथा लेखक और पत्रकार भी थे।
अपने समय के सर्वाधिक चर्चित और विवादास्पद
अफसानानिगार मंटो का साहित्यिक जीवन 'ला-मिजराव' और
गोर्की की कहानियों के अनुवाद से शुरू हुआ। मंटो आदमी पर आदमी द्वारा होने वाले अत्याचार के विरुद्ध थे। उसने शुरू से ही आमजन के दुःख दर्द में निजी दुःख-दर्द महसूस किया।
मंटो की पहली कहानी : तमाशा (1931) अंतिम कहानी कबूतर और कबूतरी। मंटो की
जिन कहानियों पर मुकदमे चले 'काली सलवार', 'बू', 'ठंडा गोश्त', 'धुआं', 'खोल दो', 'ऊपर, नीचे और दरम्यान'। मंटो का साहित्यिक जीवन कुल 25 वर्षों का रहा। मंटो ने लगभग 270 कहानियाँ लिखीं हैं। इनकी कुल 21 कहानी संग्रह और एक अफसानचा (लघुकथा) संग्रह है।
प्रमुख रचनाएँ: 'आतिशपारे' (1936), 'चुगद', 'मंटो के अफसाने' (1940), 'धुआँ' (1941),
'अफसाने और ड्रामे' (1943), 'लज्जत-ए-संग' (1948), 'स्याह हाशिए' (अफसानचे-1948), 'बादशाहत का खात्मा' (1950), 'खाली बोतलें' (1950), 'लाउड स्पीकर' (स्कैच), 'गंजे फरिश्ते' (स्कैच), 'मंटो के मजामीन', 'नमरूद की खुदाई' (1950), 'ठंडा गोश्त' (1950), 'याजिद' (1951), 'पर्दे के पीछे' (1953), 'सड़क के किनारे' (1953), 'बगैर उनवान के' (बिना शीर्षक के-1954), 'बगैर इजाजत' (1955), 'बुर्के' (1955), 'सरकण्डों के पीछे' (1955), 'रत्ती, माशा तोला' (1956), 'काली सलवार' (1961), 'मंटो की बेहतरीन कहानियाँ' (1963), ताहिरा से ताहिर' (1971)।
सम्मान: 14 अगस्त 2012 को मंटो को मरणोपरांत पाकिस्तान का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान
'निशान-ए-इम्तयाज' के अवार्ड से नवाजा गया।
निधन : 18 जनवरी, 1955 लाहौर (पाकिस्तान) में अधिक मदिरापान से निधन हुआ।
जन्म : 11 मई, 1912 को लुधियाना (पंजाब) के क़स्बा समराला के एक कश्मीरी परिवार में। उनके पिता गुलाम हसन नामी वैरिस्टर और सेशन जज थे।
शिक्षा : मुस्लिम हाई स्कूल अमृतसर, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी। मंटो कहानीकार के साथ-साथ फिल्म और रेडियो पटकथा लेखक और पत्रकार भी थे।
अपने समय के सर्वाधिक चर्चित और विवादास्पद
अफसानानिगार मंटो का साहित्यिक जीवन 'ला-मिजराव' और
गोर्की की कहानियों के अनुवाद से शुरू हुआ। मंटो आदमी पर आदमी द्वारा होने वाले अत्याचार के विरुद्ध थे। उसने शुरू से ही आमजन के दुःख दर्द में निजी दुःख-दर्द महसूस किया।
मंटो की पहली कहानी : तमाशा (1931) अंतिम कहानी कबूतर और कबूतरी। मंटो की
जिन कहानियों पर मुकदमे चले 'काली सलवार', 'बू', 'ठंडा गोश्त', 'धुआं', 'खोल दो', 'ऊपर, नीचे और दरम्यान'। मंटो का साहित्यिक जीवन कुल 25 वर्षों का रहा। मंटो ने लगभग 270 कहानियाँ लिखीं हैं। इनकी कुल 21 कहानी संग्रह और एक अफसानचा (लघुकथा) संग्रह है।
प्रमुख रचनाएँ: 'आतिशपारे' (1936), 'चुगद', 'मंटो के अफसाने' (1940), 'धुआँ' (1941),
'अफसाने और ड्रामे' (1943), 'लज्जत-ए-संग' (1948), 'स्याह हाशिए' (अफसानचे-1948), 'बादशाहत का खात्मा' (1950), 'खाली बोतलें' (1950), 'लाउड स्पीकर' (स्कैच), 'गंजे फरिश्ते' (स्कैच), 'मंटो के मजामीन', 'नमरूद की खुदाई' (1950), 'ठंडा गोश्त' (1950), 'याजिद' (1951), 'पर्दे के पीछे' (1953), 'सड़क के किनारे' (1953), 'बगैर उनवान के' (बिना शीर्षक के-1954), 'बगैर इजाजत' (1955), 'बुर्के' (1955), 'सरकण्डों के पीछे' (1955), 'रत्ती, माशा तोला' (1956), 'काली सलवार' (1961), 'मंटो की बेहतरीन कहानियाँ' (1963), ताहिरा से ताहिर' (1971)।
सम्मान: 14 अगस्त 2012 को मंटो को मरणोपरांत पाकिस्तान का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान
'निशान-ए-इम्तयाज' के अवार्ड से नवाजा गया।
निधन : 18 जनवरी, 1955 लाहौर (पाकिस्तान) में अधिक मदिरापान से निधन हुआ।
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