Meri Aapbeeti ( Kalepani Ki Karawas Kahani )
हाल ही में देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' की कड़ी में राष्ट्र को संबोधित करते हुए भाई परमानंद जी के विराट व्यक्तित्व, उनके त्याग और उनकी 150वीं जयंती के ऐतिहासिक अवसर का विशेष उल्लेख किया। प्रधानमंत्री जी ने स्मरण कराया कि किस प्रकार आर्य समाज के सिद्धांतों और वैदिक मूल्यों से प्रेरित होकर उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र-निर्माण तथा सामाजिक चेतना के जागरण में समर्पित कर दिया।

भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का इतिहास अनगिनत बलिदानों, वैचारिक क्रांतियों और राष्ट्रभक्ति की अखंड तपस्या से परिपूर्ण है। इस गौरवमयी इतिहास में अमर हुतात्मा भाई मती दास जी के वंशज, प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक, महान शिक्षाविद् एवं आर्य समाज के अग्रदूत भाई परमानंद जी (4 नवंबर 1876 – 8 दिसंबर 1947) का स्थान अत्यंत वंदनीय है।
हाल ही में देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' की कड़ी में राष्ट्र को संबोधित करते हुए भाई परमानंद जी के विराट व्यक्तित्व, उनके त्याग और उनकी 150वीं जयंती के ऐतिहासिक अवसर का विशेष उल्लेख किया। प्रधानमंत्री जी ने स्मरण कराया कि किस प्रकार आर्य समाज के सिद्धांतों और वैदिक मूल्यों से प्रेरित होकर उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र-निर्माण तथा सामाजिक चेतना के जागरण में समर्पित कर दिया।
राष्ट्रनायक भाई परमानंद: त्याग और क्रांति की अमर गाथा
पंजाब के झेलम जिले के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे भाई परमानंद जी ने पंजाब विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत लाहौर के डी.ए.वी. कॉलेज में अध्यापन कार्य किया। वे केवल विचारों तक सीमित रहने वाले मनीषी नहीं थे, अपितु एक ओजस्वी कर्मयोगी थे। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड और अमेरिका जैसे देशों की यात्राएं कर प्रवासी भारतीयों को संगठित किया तथा वे ऐतिहासिक 'ग़दर पार्टी' के संस्थापक सदस्यों में अग्रणी रहे।
प्रथम लाहौर षड्यंत्र केस (1915) में उनकी क्रांतिकारी भूमिका के कारण ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें पहले मृत्युदंड सुनाया, जिसे जनदबाव और विभिन्न परिस्थितियों के चलते आजीवन कारावास में बदलकर उन्हें अंडमान की कुख्यात 'कालापानी' (सेल्यूलर जेल) भेज दिया गया। घोर यातनाओं से मुक्त होने के बाद भी उनका राष्ट्र-यज्ञ अनवरत जारी रहा। वे लाहौर के नेशनल कॉलेज के चांसलर बने, जहाँ से अमर शहीद भगत सिंह और सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों ने राष्ट्रभक्ति का पाथेय ग्रहण किया। कालांतर में उन्होंने हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में भी देश का मार्गदर्शन किया।
'मेरी आपबीती': केवल आत्मकथा नहीं, स्वाधीनता संग्राम का प्रामाणिक इतिहास
भाई परमानंद जी उन गिने-चुने स्वतंत्रता सेनानियों में थे, जिन्हें ब्रिटिश शासन ने अपनी 'अत्यंत खतरनाक विद्रोहियों' की सूची में रखा था। अंडमान की सेल्यूलर जेल में स्वतंत्रता सेनानियों को दी जाने वाली अमानवीय प्रताड़नाओं, निरंतर कोल्हू चलवाने जैसे अक्लांत श्रम और क्रूर दमन चक्र का जो मर्मस्पर्शी व निष्पक्ष विवरण उन्होंने प्रस्तुत किया है, वह अद्वितीय है।
उनकी कालजयी आत्मकथा 'मेरी आपबीती' केवल व्यक्तिगत संस्मरणों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह बीसवीं सदी के भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, औपनिवेशिक दमन नीति और तत्कालीन वैचारिक मंथन का एक सजीव व ऐतिहासिक दस्तावेज है।
'नयी किताब' का यह विशिष्ट और संपूर्ण संस्करण क्यों विशेष है?
दशकों पूर्व 'मेरी आपबीती' उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी—तीनों भाषाओं में प्रकाशित हुई थी, किंतु तीनों संस्करणों की सामग्री में कुछ भिन्नताएं थीं:
- उर्दू एवं हिंदी के मूल संस्करणों में मुख्यतः अंडमान की कालापानी जेल की यातनाओं तक का ही विवरण उपलब्ध था।
- अंग्रेजी संस्करण में बाद में भाग-2 जोड़कर सेल्यूलर जेल के बाद के उनके जीवन की झांकी तथा अपनी धर्मपत्नी के नाम लिखा गया ऐतिहासिक पत्र भी सम्मिलित किया गया था।
'नयी किताब' प्रकाशन ने इस ऐतिहासिक आवश्यकता को अनुभव करते हुए, सभी भाषाओं के बिखरे हुए संदर्भों और संपूर्ण सामग्री को एक स्थान पर संकलित कर इस नवीन, प्रामाणिक एवं वृहद संस्करण को प्रकाशित किया है। यह वर्तमान संस्करण भाई परमानंद जी की मूल, सर्वांगीण और सर्वाधिक प्रामाणिक आत्मकथा का स्वरूप प्रस्तुत करता है, जो सामान्य पाठकों के साथ-साथ इतिहास के शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य अध्ययन सामग्री है।
इस ऐतिहासिक धरोहर को अपनी व्यक्तिगत लाइब्रेरी का हिस्सा बनाएं
राष्ट्र के अमर सेनानियों के त्याग और उनकी वास्तविक गाथा को पढ़ना प्रत्येक राष्ट्रप्रेमी के लिए आत्मबोध का माध्यम है।
भाई परमानंद जी की यह ऐतिहासिक कृति अब 'नयी किताब' पर पाठकों के लिए उपलब्ध है।
-> पुस्तक प्राप्त करने हेतु नीचे दिए गए लिंक पर जाएँ:
-> मेरी आपबीती: कालापानी की कारावास कहानी - 'नयी किताब'
इस लेख में ज़िक्र की गई किताबें
सीधे नई किताब से, छूट के साथ