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Bhago Nahi Duniya Ko badalo
इस किताब की भाखा देख के कितने ही पढ़ने वाले अचरज करेंगे, लेकिन उमेद है, कि वह नाराज नहीं होंगेय काहे से कि यहाँ उन्हें ऐसे सैकड़ों सबद मिलेंगे, जिनको उन्होंने माँ का दूध पीने के साथ सीखा है और अब भी वह ऐसे ही फिर मीठे लगते होंगे, लेकिन मैंने इस पोथी को भाखा फैलाने के ख्याल से नहीं लिखा । एक बरस पहले जो कोई कहता, कि तुम इस भाखा में एक किताब लिखोगे, तो मुझे विसवास न होता । मैंने छपरा–बलिया की भाषा में आठ छोटे–छोटे नाटक लिखे, और मैंने देखा कि बातों को रखने में कोई कठिनाई नहीं है । उस भाखा में मैं इस पोथी को लिख सकता था, लेकिन फिर वह चार–पाँच जिलों ही के काम की होती । लेकिन इस तरह की हिन्दी में लिखना बहुत मुसकिल मालूम होता था । तो भी मैंने सोचा कि जिन लोगों के पास मैं अपनी बातों को पहुँचाना चाहता हूँ, उनके लिए ऐसी ही भाखा में लिखने की कोसिस करनी चाहिये ।
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