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Bhartiya Darshan Mein Paryavaran
परंपरा में जब गतिशीलता आती है और जड़ हो चुकी संस्कृति समकालीन परिस्थितियों के अनुरूप बदलने में सक्षम हो जाती है तब वह संस्कृति तार्किकता के साथ जुड़कर आधुनिकता में प्रवेश कर जाती है । इस तरह मानवीय जीवन एवं सामाजिक पहलुओं में परंपराएं और आधुनिकता इनके अभिन्न अंग बनते हैं । जहां तक पर्यावरण का प्रश्न है वह प्रकृति के करीब है जो अपने विभिन्न उपादानों को लेकर एक अलग पहचान बनाती है । प्रकृति और मानव के बीच की कड़ी पर्यावरण है जो उसके विकास एवं विनाश दोनों में सहायक होती है । भारतीय दर्शन के षड्दर्शन में सांख्य दर्शन का महत्वपूर्ण स्थान है तथा सबसे प्राचीन भी है । सांख्य दर्शन में प्रकृति को श्रेष्ठ माना गया है । प्रकृति ही सारी सृष्टि का आधार है । इस सृष्टि में मनुष्य प्रकृति की श्रेष्ठ कृति है । इस तरह मनुष्य और प्रकृति के सहसम्बन्ध से ही सभ्यताएं और संस्कृतियां विकसित हुर्इं । जब भी इसमें असंतुलन हुआ उसके परिणामस्वरूप ही विश्व की कई सभ्यताएं तथा संस्कृतियां इतिहास के गोद में समा गयीं । प्रकृति अपना संतुलन अपनी शर्तों पर कायम करती है । जब कभी भी इसमें बाह्य हस्तक्षेप संभव होता है तब वह प्रलय की स्थिति उत्पन्न करती है । ऐसे प्रलय इतिहास में बार–बार दुहाराए गए मिलते हैं जिसके निशान हमें पुरानी सभ्यताओं के अवशेष के रूप में धरती में दबे खुदाई के बाद प्राप्त होते हैं । यह एक अलग शोध के विषय हैं कि विलुप्त सभ्यताओं के कारणों में तत्कालीन समाज के द्वारा प्रकृति के साथ कितना छेड़छाड़ किया गया था लेकिन आधुनिक संदर्भ में इसे हम स्पष्ट रूप से देख सकते हैं । आधुनिकता ने मनुष्य के लिए एक नए संसार का दरवाजा खोला और प्राचीन जीवन दृष्टि से एक अलग नजरिया प्रस्तुत किया । इस आधुनिकता में मानव समाज ने अपनी सुख–सुविधाओं को पाने की होड़ में प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ा है और इस बिगाड़ के परिणाम स्वरूप ओजोन स्तर में ह्रास दिखने लगा है ।
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