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Do Boond Jal
रात होने लगती है, तो चमगादड़ों के झुण्ड इस कटे हुए हिस्से की ओर आते हुए दिखाई देने लगते हैं। सुबह होने लगती है, तो गीदड़ों के झुण्ड पूँछ टाँगों में दबाए शहर की ओर जाते दिखाई देते हैं। रेशमा नहीं जानती कि दूसरी औरतें कैसा महसूस करती रहती हैं। रेशमा खुद कुछ ऐसा महसूस करती रहती है, कि एक ऐसे उजाड़ मैदान की तरह, जहाँ शहर के कई मोहल्लों के निवासी दिशा निबटने जाते हैं, यह कुतुबरोड का इलाका भी शेष सारे दिल्ली शहर से कटा हुआ है। दिन-भर इस कटे हुए शहर की छोटी-छोटी कोठरियों में एक ऐसा अंधकार तना रहता है, जिसमें रेशमा हमेशा अपने भविष्य को ठीक वैसे ही टटोलने की कोशिश करती है, जैसे कोई चोर अँधेरे में तिजोरी टटोलने की कोशिश करे। रेशमा दिन-भर के तने हुए अंधकार में, दिल्ली के इस चारों तरफ से कटे हुए हिस्से की छोटी-सी कोठरी में, अपने भविष्य की उस तिजोरी को टटोलती रहती है, जिसमें किसी दूसरे की नहीं, बल्कि खुद उसी की अमानत बंद है।... मगर रोज यही होता है, अँधेरे में तिजोरी को टटोलते-टटोलते ही दिन का तना हुआ अंधकार रेशमा की अँगुलियों से काले परदे की तरह छिटक कर, अलग चला जाता है और सामने रात की आँखों को चौंधिया देने वाली रोशनी चमचमाती नजर आती है।
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