• New product

Gubbare Par Africa Yatra

(0.00) 0 Review(s) 
2026

Select Book Type

Earn 5 reward points on purchase of this book.
In stock

लंदन में 14 जनवरी सन् 1862 को राजकीय भौगोलिक समिति की एक बैठक हुई। वहाँ पर बहुत से विद्वान् उपस्थित थे। प्रेसीडेण्ट सर फ्रांसिस एक आवश्यक भाषण देने को तत्पर हुए। श्रोताओं ने हर्षित होकर करतल ध्वनि की। सर फ्रांसिस ने कहना प्रारम्भ किया, "दुनिया की भौगोलिक खोजों से पता चलता है कि इंग्लैंड हमेशा दूसरे देशों से आगे रहा है। डाक्टर फर्गुसन अब इंग्लैंड की प्रसिद्धि को और भी अधिक बढ़ा देंगे, अगर उनका यह प्रयोग सफल हो गया" (श्रोतागण खुशी से चिल्लाये, "अवश्य सफल होगा, अवश्य सफल होगा") और अगर असफल हो गया तो हमारे लिये बहुत बड़ी चिंता का विषय होगा।" हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। दुनिया के पाँच भागों से आये हुए साहसी व्यक्तियों के समूह में से एक बहुत ही साहसी और उत्साही व्यक्ति चिल्ला उठा, 'फर्गुसन की जय' परन्तु राजकीय भौगोलिक समिति, सर फ्रांसिस के भाषण के समय उतनी अधिक उत्साह से पूर्ण नहीं थी। भाग्यवश इंग्लैंड अपनी भावनाएँ केवल शब्दों में ही न प्रकट करता था; अपने कार्यों से भी उत्साह प्रकट करता था। वह व्यापार आदि से रुपये उतनी ही जल्दी पैदा कर लेता था जैसे टकसाल में बन सकते हैं। उस समय डाक्टर फर्गुसन का साहस और उत्साह बढ़ाने वालों की संख्या 2500 थी। समिति के एक सदस्य ने प्रेसीडैण्ट से पूछा कि डा. फर्गुसन यहाँ पर क्यों नहीं आये? सर फ्रांसिस ने उत्तर दिया "डाक्टर वही करेंगे, जैसा कि समिति कहेगी।" वहाँ पर उपस्थित सभी व्यक्ति डाक्टर फर्गुसन को देखना चाहते थे। एक वृद्ध सैनिक अफसर ने कहा- "मुझे तो यह सब बहुत रहस्यमय जान पड़ता है।" श्रोतागण अविश्वास भरी ध्वनि से चिल्लाये- "हम विश्वास नहीं करते कि कोई व्यक्ति डाक्टर फर्गुसन नामक है भी।"

You might also like

Reviews

No Reviews found.