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Hauldar
अलमोड़ा की आंचलिक पृष्ठभूमि को लेकर लिखा गया मेरा पहला प्रकाशित उपन्यास है। यों एक अन्य आंचलिक उपन्यास 'चिट्ठीरसैन' कलकत्ता के 'आदर्श' में धारावाहिक प्रकाशित हो चुका है। 'हौलदार' और 'चिट्ठीरसैन' की भाषा-भूमि में आंचलिक-शब्दों के बुरूंश-फूल खिलें-अन्य हिन्दी उपन्यासों की भाषा-भूमि से इसका प्राकृतिक सौन्दर्य अलग दिखाई दे (जैसे 'देश' (Plains) की समतल भूमि से पहाड़ों की पथरीली प्रकृति)- यह लेखक का उद्देश्य रहा है। इतर-प्रान्तीय पाठकों को मेरा कृतित्व दुर्बोध न लगे, इस घोर सचेत रहा हूँ। आंचलिक शब्दों की अपेक्षा, आंचलिक शिल्प की प्रमुखता ही रहे-ऐसा मेरा प्रयास रहा है, मगर सफलता तो इसकी और ही आँकेंगे। जो आंचलिक शब्द प्रयुक्त हुए हैं, उनमें से अधिकांश को मैंने उनके अक्षर-आकर्षण, अर्थ-गाम्भीर्य और ध्वनि-वैशिष्ठ्य के आधार पर ही दिया है-इस आशा के साथ, कि इनमें से कई शब्द हिन्दी साहित्य के शब्द-कोष की वृद्धि करने में समर्थ होंगे... आंचलिक मुहावरों और लोकोक्तियों में से कुछ कुमाऊँ के पूर्व-प्रचलित हैं, कुछ की रचना-सर्जना मैंने की है। मूलतः मैं यहाँ का लोक-साहित्यकार ही हूँ। इस नाते, नए मुहावरों और लोकोक्तियों की इस सृजन-चेष्टा में मुझे सुख-सन्तोष मिला है। औरों को भी रुचा मेरा यह प्रयास, तो अपना श्रम सार्थक समझेंगा।
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