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Kissa Narmadaben Gangubai
उपन्यास से कुछ अंश न सात समन्दर-पार का, न राजा इन्दर के दरबार का, और न शहजादे शहरयार या साढ़े तीन यार का- यह किस्सा है, गाँठिया-पापड़ी, ऊसल-पाव-मसाला डोसा, बटाटा बड़ा, चालू-स्पेशल चा और भेल-पुरी के देश बम्बई का ।... जहाँ पारले की औरेंज की बाटली फकत पाँच आने में और ग्लूको-कोला की बाटली फकत चार आने में-लेकिन, इन दोनों से भी कहीं मीठी-कसैली दो बेगमें- एक भारत के उत्तरी ध्रुव कश्मीर की, दूसरी दक्षिणी-ध्रुव बैंगलोर-मंगलोर की-सिर्फ आठ आने में। जहाँ, वस्ताद के शब्दों में, रोज़ रोज़ जिन्दगी के नए-नए 'डिरामे' होते हैं। डिरामे, जिनका मखमली-पर्दा सिर्फ आखिरी सीन के समय खुलता है।... जहाँ तिरिया के चार नहीं, सिर्फ दो भेद होते हैं। जहाँ जिन्दगी-मौत में सिर्फ 'हाईफन' का फासला है।... जहाँ किसी भी सुन्दर तिरिया की ओर होंठों को तिरछा कर, चारमीनार सिगरेट या सफेद-धागा-टुकड़ी बीड़ी का धुआँ छोड़ते हुए, दाएँ हाथ से बाएँ हाथ को कलेजे और जिगर के संधिस्थल पर दबाकर, 'हाए, मेरी सुरैया।' कहकर, सर्द आहें भरने वाले फुटपाली के शहेन्शाहों की बस्ती है।...
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