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Krantikari Itihas (Nana ke Patra Natin Ke Naam)
भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन के इतिहास की खोजबीन से जुड़ी अपनी यात्राओं के बीच में प्रायः उन यादनामों को काग़ज़ पर उतार लेता रहा हूं जो काव्या को लिखी गई चिट्ठियों के रूप में हैं। यह बता दिया जाए कि यह इबारतें विभिन्न जगहों पर बिखरी पड़ी विप्लवी कथाओं का मेरा मुख्तसर-सा बयान हैं। काव्या को लिखे यह छोटे-छोटे पत्र कई बार अधिक सूचनाप्रद और गम्भीर भी हो गए हैं। इन्हें लिखते हुए इस ओर से मैं कतई बेखबर नहीं रहा, लेकिन यह सोचकर इसे इसी तरह उकेरता चला गया कि बढ़ती उम्र के साथ वह बार-बार इनका पुनर्पाठ कर इन्हें समझने की भरपूर कोशिश करेगी। मैं जानता हूं कि इस ओर उसकी सघन रुचियां हैं। मैंने उसमें बहुत छुटपन से इस रुझान को देखा-समझा है। वह निरी बच्ची थी जबकि उसने ठीक से बोलना भी शुरू नहीं किया था, वह मेरे बैठके में टंगी भगतसिंह की बड़ी पेन्टिंग के बारे में बार-बार पूछती और बताने पर उन दिनों इस शहीद का नाम भी ठीक से उच्चारित नहीं कर पाती थी। हम सब यह देखकर हंसते लेकिन वह मेरी अलमारी से भगतसिंह के चित्रों वाले कवर की सारी किताबें जिद करके अपने सामने रखवा लेती और उन्हें घंटों उलटती-पलटती रहती। तब मैं उस पर सघन निगरानी रखता कि वह उन्हें नोच-फाड़ न दे लेकिन उसने ऐसा कभी नहीं किया।
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