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Mukh Sarovar Ke Hans
गढ़ी चम्पावत के छत्रधारी खड्गधारी राजा कालीचन्द ने आठवाँ विवाह किया था। सन्तान-मुख देखने, पितर-ऋण उतारने के लिए। आठवीं रानी रुपाली, डोटी देश की राजकुमारी, कुमाऊँ-पछाऊँ की राजधानी गढ़ी चम्पावत नगरी में आई। अप्रतिम रूप, उद्दाम यौवन और असाधारण मानी मन लिए। इधर कुमाऊँ के बाईस सूर्य-से वफौलबन्धु भी, महरगाँव की एक लली दूधकेला से शादी करके, गढ़ी चम्पावत नगरी लौटे। उन्होंने अपने पराक्रम से पंचनाम देवों के मन्त्र-पुत्र मल्लों को पराभूत कर, गढ़ी चम्पावत नगरी के राज द्वारों का चौकीदार बनाकर रखा। - बाईस भाई बफौलों के रूप-शौर्य को देखते ही, आठवीं रानी रुपाली का चपल मन कामुकता की चंचल-धार में, तैरना न जानने वाली मछली-सा, बह गया। वह बाईस भाई बफौलों की बाईस गद्दों-तकियों वाली सेज की एक सोने वाली बनने, बाईस मृदंगों की एक थाप, बाईस स्वरों की एक रागिनी बनने-कामातुर हो, बफौलों के महल में गई। सत् रह जाए, बफौलीकोट की धरती-पार्वती का। बफौलों ने उससे कहा- "माँ हो, रक्त-धार नहीं, दूध-धार दो।" और, पुण्य सहेज लिया, पाप ठुकरा दिया। चोट-खाई नागिन-सी रुपाली रानी लौटी। बफौलों के आँगन में बाईस मुक्के छाती में मारे, बाईस उल्टी हथेलियाँ माथे से लगा गई- "बफौलों का वंश-बीज-नाश करूंगी, तभी अन्न-दाना, घूँट-पानी ग्रहण करूँगी!" और उसने यही किया।
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