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Usha Yadav Baal Kahani Samagra
साहित्य में बालकों की सर्वाधिक प्रिय विद्या बालकहानी है। बच्चों के थोड़ा समझदार होते ही माँ-दादी-नानी से कहानी सुनने-सुनाने का सिलसिला शुरू होता है। खेल-खेल में, बातों-बातों में परिवार के बड़े लोग बच्चों को कहानी-किस्सों के जरिये समाज के साथ आचार-विचार-व्यवहार आदि सिखाते रहते हैं। थोड़ा और बड़ा होते ही बच्चा कहानी को स्वयं ही पढ़ना सीख जाता है तो कहानियों में चित्रित संवेदना-करुणा, दया-परोपकार, संबंध-नीति आदि स्वतः उसके साथ जुड़ते चले जाते हैं। कहानियाँ उसके व्यक्तित्व, उसकी सोच, रुचियों को दिशा देती रहती हैं। बालक के विकास में उसके द्वारा पढ़ी और सुनी जाने वाली कहानियों की बहुत बड़ी भूमिका होती है। पाठ्यक्रम की नीरसता को दूर करने और बालक के चरित्र को सही दिशा देने के लिए भी कहानियाँ पढ़ाई जाती हैं। सुप्रसिद्ध साहित्यकार उषा यादव के अनुसार सच्चा बालसाहित्य मनोरंजन के साथ बालक को संस्कारित करने का लक्ष्य रखता है। इसी उद्देश्य के साथ उन्होंने बच्चों के लिए बालकहानियों का एक वृहद संसार रच दिया है। बालजीवन के छुए-अनछुए पहलुओं से आकार पाती, नाना रस-रंग, स्वाद-गंध दर्शाती इन कहानियों का कैनवास बहुत विस्तृत है। एक ओर इनमें शिशु-मन को साकार करते शैशव के बोलते हुए चित्र हैं, तो दूसरी ओर घर-परिवार, पाठशाला-समाज से जुड़े जीवनपथ पर आगे बढ़ते बालक के चित्र हैं।
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