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10 Mahan Samaj Sudharak
कहते हैं कि जब-जब समाज का पतन होता है, तब-तब उसके उत्थान के लिए कोई न कोई महापुरुष इस धरती पर जन्मता है और समाज सुधार के क्रांतिकारी कार्य करके लोगों का मार्गदर्शन करता है। भारत की संस्कृति को अगर तीन शब्दों में व्यक्त करना हो तो कह सकते हैं कि हमारी संस्कृति है अर्पण, तर्पण और समर्पण। तीनों में त्याग है और यह त्याग कर्तव्य रूपी है, उपकार रूपी नहीं। अर्थात् त्याग करके हम किसी पर उपकार नहीं करते। समाज के लिए किया गया त्याग अर्पण हैं, पितरों के लिए, माता-पिता के लिये किया गया त्याग तर्पण है और भगवान के लिए किया गया त्याग समर्पण कहलाता है। इनमें ज्यादा महत्वपूर्ण समाज के लिए किया जाने वाला त्याग है, क्योंकि यह हमारा कर्तव्य है और समाज सुधार का पहला मंत्र है। जब से यह दुनिया बनी है, तब से ही समाज निरंतर प्रगति करता आया है। इसमें सुधार होता रहा है और सुधार के लिए सुधारक यहां जन्मते रहे हैं। आज के युग के संदर्भ में भी देखें तो हमारे आसपास तेजी से हो रहे परिवर्तनों के मद्देनजर समाज सुधारों की आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता। ऐसे सुधार जितनी जल्दी हो सकें, उतना ही अच्छा होगा। समाज सुधारों के संबंध में दो प्रश्न महत्वपूर्ण हैं। पहला यह कि इनमें राज्य की क्या भूमिका हो? दूसरा यह कि धर्म की क्या भूमिका हो? कुछ लोगों का मानना है कि राज्य को इसमें सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए और समाज सुधार के लिए हरसंभव प्रयास करने चाहिए।
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