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10 Mahan Veerangnain
एक दिन हमारे कार्यालय में प्रख्यात साहित्यकार अमृता प्रीतम के प्रेमी इमरोज, जिन्होंने अमृता के साथ बिना विवाह किए 40 वर्ष गुजारे, आए, उनके साथ उमा त्रिलोक नामक महिला लेखिका भी थी। दरअसल उमा जी हमारे पास अमृता और इमरोज के प्रेम पत्रों का अनुवाद लेकर आई थीं, जिसको वह पुस्तक के रूप में छपाना चाहती थीं और इमरोज को सिफारिश के तौर पर लाई थीं, क्योंकि जिस प्रकाशन संस्थान में मैं कार्यरत था, वहाँ अमृता-इमरोज की कई पुस्तकें पहले ही छप चुकी थी। बातचीत के दौरान भगवान श्रीराम और माता सीता की चर्चा शुरू हो गई। इमरोज ने कहा कि राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं, लेकिन यह कहाँ की मर्यादा थी कि उन्होंने गर्भवती सीता को वनों में भेज दिया? हमारे संपादक नफीस ने भी हाँ-में-हाँ मिलाई और उमा त्रिलोक तो और भी चार कदम आगे बढ़ गई, उन्होंने कहा, "राम को विष्णु का अवतार माना जाता है, इसलिए उनमें स्त्रियों के प्रति आदर भाव या मर्यादा कैसे आ सकती थी, क्योंकि विष्णु स्वयं लक्ष्मी जी से पैर दबवाते रहते हैं। इन्होंने औरत को चरणों की धूल के सिवाय और कुछ समझा नहीं।"
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