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Chandrakanta

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2025
978-93-48409-26-3

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शाम का वक्त है, कुछ-कुछ सूरज दिखाई दे रहा है, सुनसान मैदान में एक पहाड़ी के नीचे दो शख्स वीरेंद्रसिंह और तेजसिंह एक पत्थर की चट्टान पर बैठे आपस में कुछ बातें कर रहे हैं। वीरेंद्रसिंह की उम्र इक्कीस या बाईस वर्ष की होगी। यह नौगढ़ के राजा सुरेंद्रसिंह का इकलौता लड़का है। तेजसिंह राजा सुरेंद्रसिंह के दीवान जीतसिंह का प्यारा लड़का और कुंअर वीरेंद्रसिंह का दिली दोस्त, बड़ा चालाक और फुर्तीला, कमर में सिर्फ खंजर बांधे, बगल में बटुआ लटकाये, हाथ में एक कमंद लिए बड़ी तेजी के साथ चारों तरफ देखता और इनसे बातें करता जाता है। इन दोनों के सामने एक घोड़ा कसा-कसाया दुरुस्त पेड़ से बंधा हुआ है। कुंअर वीरेंद्रसिंह कह रहे हैं, "भाई तेजसिंह, देखो मुहब्बत भी क्या बुरी बला है जिसने इस दर्जे तक पहुंचा दिया। कई दफे तुम विजयगढ़ से राजकुमारी चंद्रकान्ता की चीठी मेरे पास लाये और मेरी चीठी उन तक पहुंचाई जिससे साफ मालूम होता है कि जितनी मुहब्बत मैं चंद्रकान्ता से रखता हूं उतनी ही चंद्रकान्ता मुझसे रखती है और हमारे राज्य से उसके राज्य के बीच सिर्फ पांच कोस का फासला ही है, इस पर भी हम लोगों के किये कुछ नहीं बन पड़ता। देखो इस खत में भी चंद्रकान्ता ने यही लिखा है कि 'जिस तरह बने जल्द मिल जाओ'।"

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