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Taslima Nasrin : Nirvasan Mein Sangharsh
बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन के रचनाकार व्यक्तित्व का निर्माण पितृसत्ता और धर्माध ताकतों से लड़ते-भिड़ते हुआ है। आज भी इन ताकतों से वे युद्ध किए जा रही हैं। तसलीमा का युद्ध एक अकेली स्त्री का युद्ध नहीं है, वल्कि समूची स्त्री जाति का युद्ध है। संसार में सबसे अनमोल वस्तु मनुष्य का जीवन है और इस जीवन को भी दाँव पर लगाकर जब तसलीमा यह युद्ध करती हैं तो कहना न होगा कि तब उनका युद्ध और ज्यादा तात्पर्यपूर्ण हो जाता है। तसलीमा की रचनाओं में सर्वत्र स्त्री-पुरुष विषमता के प्रति प्रतिरोध है। कदाचित इसीलिए वे प्रतिरोध की नायिका हैं। अनवरत प्रतिरोध की ताकत ने ही उन्हें बेबाकी दी है। उनकी बेवाक कलम स्त्री शोषण के प्रति जब आक्रोश व्यक्त करती है, धर्मांधता फैलानेवाली शक्तियों के खिलाफ युद्ध का निनाद करती है और समता, मानवतावाद और मानवाधिकार के पक्ष में आवाज उठाती है तो कभी कट्टरपंथियों तो कभी पितृसत्ता का गुस्सा उबल पड़ता है जो कभी हमले के रूप में, कभी फतवों के रूप में या नजरबंद कर रखने के रूप में प्रस्फुटित होता है। इसके बावजूद तसलीमा न झुकती हैं न टूटती हैं, बल्कि और ताकत के साथ युद्ध के मैदान में उतर आती हैं। उनकी यह ताकत हर कृति में देखी जा सकती है। तसलीमा को धार्मिक कट्टरपंथ और पुरुप प्रभुत्व का विरोध करने की कीमत अपनी किताबों पर प्रतिबंध, मौत के फतवों और देश निकाले के रूप में 1994 से चुकानी पड़ रही है। तसलीमा का निर्वासित जीवन संघर्षों का अनंत सिलसिला है और उनका साहित्य उन संघों की दास्तान। उस दास्तान की झलक पाठक इस पुस्तक में पाएंगे।
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