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Vaishvik Gandhi : Bharatvanshi Chitt Ke Shilpi

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गांधी भारत की चिरंतन सत्यान्वेषी और सत्याग्रही परंपरा का अवगाहन कर अपने चित्त को उसमें नियोजित करने वाले साधक थे। उन्होंने अपनी विकट तपश्चर्या और पुरुषार्थ के बल से इस परंपरा को स्वायत्त किया और फिर अपने आचरण से उसे सिद्ध किया। इसीलिए गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने उन्हें 'महात्मा' कहकर संबोधित किया। जीवन की प्रयोगशाला में सत्य की खोज करते-करते ही उन्हें 'सत्याग्रह' का अमोच साधन प्राप्त हुआ; 'अहिंसा' जिसकी परीक्षा की कसौटी थी। इसी क्रम में उन्होंने यह विश्वास अर्जित किया था कि 'सत्य ही ईश्वर है' और यह संपूर्ण ब्रह्मांड इस सत्य रूपी ईश्वर से परिव्याप्त है। इस विश्वास के बल पर उन्होंने समस्त मानव जाति से स्वयं को एकात्म किया और फलस्वरूप सत्यनिष्ठ विग्रहवान् धर्म 'राम' में अपनी 'आस्था' को संपुंजित रूप में देखा। इसी आस्था से उन्होंने विषमता-मुक्त मानव जाति का सपना सँजोया और उस स्थिति की 'रामराज्य' के रूप में परिकल्पना की। आस्था के इसी सुदृढ़ आधार पर उन्होंने अपने 'स्वधर्म' की पहचान की। स्वावलंबन, श्रम, स्वदेशी, स्वाधीनता आदि के विचार इसी ज़मीन से उपजे थे। गांधी की प्रतिष्ठा भारत के राष्ट्रीय मुक्ति-संग्राम के नायक के रूप में विशेष है। किंतु, अपनी आस्था के संबल से उन्होंने भारत और भारतीय चित्त से स्वयं को 'तदात्म' कर लिया था। परिणामतः वे 'नायक' से 'लोकनायक' और फिर 'विश्वनायक' हो गये। त्वरा और अधीरता के कारण गांधी को अंगीकार करने में कठिनाई हो सकती है, पर उनका प्रभाव विश्वव्यापी है; इसमें गांधी को समझने वाले किसी व्यक्ति को संदेह नहीं हो सकता।

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