सीधे सामग्री पर जाएँ

हर ₹100 की खरीदारी पर 2 अंक पाएँ, 1 अंक = ₹1और जानें

Stri Vimarsh/स्त्री विमर्श

Aatmkatha Aur Stri

  • पेपरबैक, हार्डबैक
  • प्रकाशन वर्ष 2018
  • ISBN 978-93-82554-79-0
₹140 MRP ₹175 20% छूट

इस किताब पर आपकी बचत ₹35

संस्करण चुनें

स्टॉक में है, विक्रेता: नई किताब प्रकाशन

  • 3 अंक पाएँअगले ऑर्डर पर ₹3 की छूट
  • UPI, कार्ड या कैश ऑन डिलीवरीसुरक्षित भुगतान, जैसे चाहें
  • सीधे प्रकाशक सेमूल संस्करण, MRP से कम दाम पर
  • इस किताब के बारे में सवाल?WhatsApp पर पूछें
सदस्यों को ऑनलाइन ख़रीद पर 5% अतिरिक्त छूट। सदस्यता मुफ़्त।और जानें
पुस्तकालय या स्कूल के लिए 10 या ज़्यादा प्रतियाँ चाहिए?दाम पूछें

किताब के बारे में

एक विधा के तौर पर हिन्दी आत्मकथा का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। उस समाज में जहाँ ‘आत्म’ के बखान को ही आत्ममुग्धता समझा जाता हो, वहाँ ‘आत्मकथा’ लेखन असाधारण साहस की माँग करता है। यह एक बड़ा कारण है, जिसके चलते तमाम आदिकालीन और मध्यकालीन रचनाकारों ने खुद को अभिव्यक्त करने के लिए ‘कविता’ को चुना, जहाँ उनका वैयक्तिक सार्वजनिक रूप धारण कर लेता है। आदिकालीन और मध्यकालीन रचनाकारों के जीवनवृत्त सम्बन्धी संकटों का एक बड़ा कारण यह भी है। ऐसे में जीवनवृत्त सम्बन्धी मनमानियाँ सामान्य बात हो जाती है और इस मनमानी की सर्वाधिक शिकार हाशिए की अस्मिताएँ ही हुई। कबीर और मीरा इसके सबसे बड़े उदाहरण है। विधाओं के मामले बड़े दिलचस्प है। ‘कथा’ का ‘आत्म’, ‘आत्म’ होकर भी ‘आत्म’ हो नहीं पाता। ‘एकपक्ष’ होकर भी ‘बहुपक्ष’ होना उसकी नियती है। ‘आत्मकथा’ का ‘आत्म’ ‘एकपक्ष’ ही रहता है, लेकिन उसके ‘एकपक्ष’ की ‘बहुपक्ष’ में तब्दीली की सम्भावनाएँ हमेशा बनी रहती है। यह सम्भावना पाठक से उसके एकात्म में निहित होती है, बावजूद इसके ‘तब्दीली’ की यह सरलीकृत सम्भावना शुरुआती स्त्री आत्मकथ्यों को ‘आत्मकथात्मक उपन्यासों’ में तब्दील कर देती है (स्फुरना देवी के ‘अबलाओं का इंसाफ’ (1927) और दिनेशनंदिनी डालमिया के ‘मुझे माफ करना’ (1974) आत्मकथ्य इसे अच्छे उदाहरण हैं)। यहीं से तमाम गड़बड़ें शुरु होती है और सारी विमर्शिकी आत्मानुभूति बनाम सहानुभुति की और भोगे हुए यथार्थ की प्रामाणिकता की छद्म बहसों में सिमटकर रह जाती है। ऐसे में अभिव्यक्ति की प्रामाणिकता की बात तो बेमानी होती ही है, प्रासंगिकता के तमाम निकष भी भोथरे हो जाते है। अच्छी बात यह है कि ऐसा शुरुआती आत्मकथाओं के साथ ही है।

पाठकों की समीक्षाएँ

किताब ख़रीदने वाले पाठकों की राय

–अभी कोई रेटिंग नहीं

यह किताब पढ़ी है? आपकी समीक्षा से दूसरे पाठकों को मदद मिलेगी।

समीक्षा लिखने के लिए लॉग इन करें
अभी कोई समीक्षा नहींAatmkatha Aur Stri पर अपनी राय लिखने वाले पहले पाठक बनें।

आपको ये भी पसंद आ सकती हैं

Vimarsh/विमर्श की और किताबें

पुस्तकालय, स्कूल या दुकान के लिए ख़रीद रहे हैं?

किताबों के नाम और प्रतियों की संख्या भेजें। हम WhatsApp पर दाम बता देंगे।

कोई और किताब ढूँढ रहे हैं?

हमारा पूरा सूची-पत्र डाउनलोड करें, या जो किताब साइट पर न मिले, उसके लिए हमें लिखें।

इस किताब की ख़रीद से जुड़े सवाल

यह किताब किन संस्करणों में मिलती है?

पेपरबैक: ₹140 (MRP ₹175)। हार्डबैक: ₹243.75 (MRP ₹325)।

क्या कैश ऑन डिलीवरी (COD) की सुविधा है?

हाँ। चेकआउट पर कैश ऑन डिलीवरी चुनें, या UPI, कार्ड या नेट बैंकिंग से ऑनलाइन भुगतान करें।

मुझे कितने अंक मिलेंगे?

हर ₹100 की ख़रीद पर 2 अंक मिलते हैं। इस किताब के पेपरबैक संस्करण पर 3 अंक मिलेंगे, यानी अगले ऑर्डर पर ₹3 की छूट।

क्या सदस्यों को अलग से छूट मिलती है?

हाँ। सदस्यों को हर ऑनलाइन ऑर्डर पर 5% अतिरिक्त छूट मिलती है, और सदस्यता बिल्कुल मुफ़्त है। सदस्यता देखें।

Aatmkatha Aur Striपेपरबैक
₹140₹175
कार्ट देखें
Aatmkatha Aur Stri - Ramshankar Khushwa - किताब का कवर इस किताब के बारे में पूछें