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Acharya Harvanshal Sharma Aur Bharitya Shemushi Parampara Hardcover

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2025

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अनुशीलन का यह विशेषांक कुछ खास है। इस कुछ खास का कारण भी वह नहीं जो प्रायः विषयगत वैशिष्ट्य आदि के कारण होता है अपितु कुछ और है। किसी व्यक्ति का जीवन-दर्शन जब तप कर कुंदन बन जाता है। तब उस कुंदन की दीप्ति से उसका समय और समाज दोनों स्वर्णिम हो उठता है। कुछ लोग इसे कर्म का कारण मानते हैं और कुठ भाग्य का। और तो और कुछ लोग कर्म और भाग्य दोनों को मानते हैं। इस संशय के त्रिक् में शास्त्र हमारी कुछ सहायता करता है, भले ही हम उसे मानें अथवा न माने यह हमारे अपने विवेक पर निर्भर करता है। ऐसा संशय भवभूति के सामने भी उनके समकालीनों ने खड़ा किया था। भवभूति को लेकर जब समकालीन कहा करते थे कि आप को वह आदर और सम्मान नहीं मिला जो अपेक्षित है। तब उनका उत्तर या कि काल अनंत है और पृथिवी विपुल है। इसलिए कोई न कोई समानधर्मा उत्पन्न होगा, जो मेरी रचनाओं का आदर करेगा। पहले लोग अपने किए का प्रोपेगंडा यों नहीं करते थे, जैसा कि आज करते हैं। यह प्रोपेगंडा भी आज का युग सत्य बन चुका है। परंतु कर्मरथी और विचारवान रचनाकारों की रचनाएँ बोलती थीं। उनका दर्शन बोलता था। समाज के प्रति, साहित्य के प्रति, मनुष्यमात्र के प्रति और राष्ट्र के प्रति उनका कृतित्य बोलता था। वस्तुतः यह सृष्टि अनुबंधमई है। सब कुछ अनुवचित है। अब सवाल उठता है कि कौन वाँधने बाला है, किससे किसको बाँधने वाला है। इसका उत्तर यही मिलता है-बाँचने वाला जगन्नियंता और वैधने वाला जीव है और जिससे बाँधता है-वह है 'कर्म'। इस प्रकार पृथिवी पर आने के पूर्व प्राणी अपने-अपने कमों से अनुबंधित हो जाता है। इस संसार में आकर वह यही करेगा, जिसे करने के लिए नियंता से उसका अनुबंध 1 हुआ है। यदि ऐसा न होता तो कबीर के यहाँ 'कमाल' न पैदा होता, जिसके लिए उन्हें कहना पड़ा 'बूड़ा वंश कवीर का, उपजा पूत कमाल।' कबीर किसी और काम को लेकर आए ये और कमाल और किसी काम को लेकर। एक बार कुछ चोरों ने तुलसी की रामचरितमानस की हस्तलिखित पांडुलिपि चुरा ली। शिकायत हुई। नगर कोतवाल चोरों को पकड़कर ले आए। तुलसी ने कहा इन्हें छोड़ दो। क्योंकि मैं प्रभु के यहाँ से रामचरितमानस लिखने के लिए भेजा गया हूँ और ये चोरी करने के लिए। तो जो किसके लिए पैदा हुआ है, जैसा अनुबंध लेकर पैदा हुआ है, यही करेगा। करता भी है। ऐसे बहुत से उदाहरण देखने को मिलते हैं। प्रो. शर्मा शिक्षा और समाज के लिए अनुबंधित होकर आए थे। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हिंदी एवं संस्कृत विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष रहे। बुदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी के कुलपति पद को गौरवान्वित किया। भारतीय हिंदी परिषद, प्रयागराज के अध्यक्ष रहते हुए हिंदी साहित्य एवं भाषा में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी के परामर्श मंडल को सुशोभित किया। वह प्रायः कहा करते थे कि "यह सब ईश्वरीय कृपा से हो रहा है। ईश्वरीय कृपा मुझ जैसे व्यक्ति को गाँव के गलियारे से निकालकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय तक ले आई जहाँ मैंने भारत की बड़ी से बड़ी महान हस्तियों का दर्शन प्राप्त किया। यह मेरा जन्म जन्मांतर का संस्कार है जो सद्‌गुरु की दया और ईश्वरीय कृपा से प्राप्त हुआ है। मुझे सदैव प्रभु आराचना का अवसर मिले और भारत भूमि की गोद में क्रीड़ा करने का सुखद आनंद।"

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