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Alakhdass
हिन्दी में भक्ति साहित्य की जो भावधाराएं मिलती हैं, साहित्य के इतिहास में उनके लिए दो संज्ञाएं प्रचलित हैं, जैसे निर्गुण काव्य और सगुण काव्य। निर्गुण काव्य के कई उपनाम हैं, यथा निर्गुण काव्य, निर्गुण मत, संत वाणी, संत साहित्य, निर्गुण साहित्य आदि। इन सबकी मूल चेतना एक ही है। भारत की प्राचीन वैदिक परंपरा में साधना के निर्गुण और सगुण दोनों रूप मौजूद थे, पर सूफी साधकों के भारत आगमन के साथ इस्लाम की निर्गुण साधना (सूफी-साधना) के विभिन्न रूपों का आविर्भाव हुआ। व्यापक संदर्भ में निर्गुण साहित्य परंपरा में प्रेममार्गी काव्यधारा अर्थात सूफी काव्य को भी समाहित किया गया है। सामाजिक, राजनैतिक दृष्टि से हिन्दू-मुस्लिम संस्कृतियों में परस्पर टकराव और आदान-प्रदान में कुछ बिन्दु ऐसे थे जो दोनों में सहज स्वीकृत थे। कहा सकता है कि आदान-प्रदान की इस प्रक्रिया में समन्वय के जो तत्त्व उभर कर सामने आए उनका मूल विचार 'निर्गुण' ही था, इसलिए निर्गुण साहित्य परंपरा में 'अलखदास' के महत्व को रेखांकित करने हेतु मैंने यह प्रयास किया है। अलखदास का जीवनकाल 1456 ई. से 1537 ई. तक माना जाता है। वे अब्दुल कुद्दूस गंगोही के नाम से विख्यात हैं। उन्होंने अपने अवधी काव्य में 'अलखदास' नाम का प्रयोग किया। उनकी अधिकांश कविताएं उनके ग्रंथ 'रुश्दनामा' में संकलित हैं। लोग उन्हें महान सूफी के रूप में जानते हैं। भारतीय निर्गुण साधना को सूफी संतों की प्रेमाभक्ति से एक नई ऊर्जा मिली। इसका प्रभाव हिन्दी के भक्त कवियों पर व्यापक रूप से पड़ा।
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