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Alochana Ka Anthswar

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2026
9789347602283

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हिन्दी साहित्य की तमाम विधाओं की तुलना में आलोचना-समीक्षा के साथ अपेक्षित न्याय नहीं हो पाया है। कहीं विद्यार्थियों के प्रश्न-पत्रों को दृष्टि में रखकर आलोचना लिखी गई, तो कहीं गुटबंदी का चक्कर है; कोई पूर्वाग्रह से ग्रसित है, तो कहीं वैयक्तिक रुचि-अरुचि, राग-द्वेष, ईर्ष्या असूया से प्रेरित होकर समीक्षा की गई। परन्तु आलोचना की इन अराजकताओं के बीच कुछ ऐसे भी समीक्षक-आलोचक हैं जो इन तमाम वैयक्तिक अनुभव को दरकिनार कर 'अर्थान्वेषी आलोचना' के जरिए सृजन की सार्थकता एवं प्रासंगिकता प्रतिपादित करते नजर आते हैं। इसी कोटि के युवा आलोचक-समीक्षक हैं डॉ. छबिल कुमार मेहेर। मेरे छात्र रहने के नाते मैं उनके लेखकीय सरोकार से पूर्णतः परिचित रहा हूँ; उनकी हर कृति को देखा-परखा हूँ; और मैंने यह लक्ष्य किया है कि कम समय में व्यापक अध्ययन, चिन्तन, मनन कर समीक्षा में सजगता, तटस्थता, निष्पक्षता एवं निर्भिकता के कारण उनकी आलोचना आज साधारण पाठकों से लेकर वरिष्ठ बुद्धिजीवि द्वारा ग्राह्य हो पाई है। इसी का प्रमाण है: 'आलोचना का अंतःस्वर'। इसमें जो तेरह लेख संकलित हैं वे सबके सब सुपाठ्य आलोचना व समीक्षा का साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं; ध्यान देने की बात यह है कि कहीं भी छबिल न खुद भटकते हैं, न ही पाठक को उलझाते हैं- सब कुछ स्पष्ट एवं सटीक । शाब्दिक चमत्कार से कोसों दूर रहकर सहज एवं सामान्य भाषा का प्रयोग उनके लेखन के ग्राह्यता का दूसरा कारण है। वे न तो समीक्षा के लिए समीक्षा करते हैं, न ही आलोचना के लिए आलोचना। इसमें उनकी पूर्व प्रकाशित सात आलोचनात्मक कृतियों, अनेकानेक सम्पादकीय पुस्तकों, और अर्द्धशतक लेखों का लेखकीय-सम्पादकीय अनुभव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।

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