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Ardhkathanak
सन् 1905 में जब मैंने स्वर्गीय गुरुजी (पं. पन्नालालजी बाकलीवाल) की आज्ञा और अनुरोध से 'बनारसी-विलास' का सम्पादन-संशोधन किया और उसके प्रारम्भ में कविवर बनारसीदास जी का विस्तृत परिचय लिखा, तब उसकी बड़ी प्रशंसा हुई और स्व. आचार्य महावीर प्रसाद जी द्विवेदी जैसे विद्वानों ने उसकी लम्बी-लम्बी समालोचनाएँ लिखीं। कविवर का उक्त परिचय एक तरह से इस 'अर्धकथानक' का ही गद्यानुवाद था। उसे पढ़कर और उसके बीच-बीच में 'अर्धकथानक' के जो पद्य उद्धृत किये गये थे, उन पर मुग्ध होकर कई मित्रों ने अनुरोध किया कि यह मूल ग्रन्थ भी ज्यों का त्यों प्रकाशित हो जाना चाहिए, अनुवाद की अपेक्षा मूल का मूल्य बहुत अधिक है। मुझे भी यह बात ठीक ऊँची और मैंने उसी समय इसको प्रकाशित करने का निश्चय कर लिया; परन्तु वह निश्चय कार्यरूप में अब 38 वर्ष के बाद परिणत हो रहा है और पाठक यह जानकर तो और भी आश्चर्य करेंगे कि इसकी प्रेस कापी मैंने अपने सहयोगी देवरीनिवासी प. शिवसहाय चतुर्वेदी जी से सन् 1912-13 के लगभग तैयार करा ली थी, फिर भी यह 30 वर्ष तक प्रेस में न जा सकी। गत वर्ष अप्रैल में इसी तरह बरसों से पड़े हुए 'जैन साहित्य और इतिहास' के काम से निबटा ही था और लगे हाथ इस पुस्तक से भी निबट लेने की सोच ही रहा था कि अचानक ता. 10 मई को मुझ पर ऐसा वज्रपात हुआ जिसकी कभी कल्पना भी न की थी। मेरे एकमात्र सुयोग्य और विद्वान् पुत्र हेमचन्द्र का चालीस गाँव में देहान्त हो गया और उसके साथ ही मेरे सारे संकल्प और सारी आशायें धूल में मिल गई। इस पुस्तक के छपाने की चर्चा करने पर स्व. हेमचन्द्र ने चालीसगाँव में ही कहा था कि "दादा, यों तो तुम्हें कभी अवकाश मिलने का नहीं, इसे प्रकाशित करने का एक ही उपाय है
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