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Baanbhatt Ki Aatmkatha : Swaroop Aur Sarokar
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने ऐतिहासिक-सांस्कृतिक चिन्तन के माध्यम से न केवल साहित्य के अध्ययन-विश्लेषण को प्रभावित किया बल्कि रचनात्मक लेखन के क्षेत्र में भी नए सन्दर्भ प्रस्तुत किए। उनके अनुसन्धानपरक लेखन ने हिन्दी साहित्य की लगभग हर विधा को नया आयाम प्रदान किया जिसने (आलोचना, निबन्ध, कथा साहित्य हो या इतिहास आदि) पाठक का ध्यान अवश्य ही अपनी ओर खींचा है और दूर तक प्रभावित भी किया है। इसका प्रमुख कारण यह है कि उनका आचार्यत्व अपने समय की संकीर्णताओं से मुक्त होकर भारत और मनुष्य के सन्दर्भ में साहित्य और संस्कृति के रचनात्मक विकास का गहन विश्लेषण करता है इससे बृहद 'मानव संस्कृति' की अवधारणा के प्रकाश में इतिहास और रचनात्मक लेखन में न ही कोई संकीर्णता उपस्थित होती है और न ही साम्प्रदायिकता। मनुष्य को 'साहित्य का लक्ष्य' मानने का मार्ग प्रशस्त करने वाले आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का जन्म 19 अगस्त, 1907 को 'आरत दुबे का छपरा', बसरिकापुर, जिला-बलिया, राज्य-उत्तर प्रदेश में हुआ था। प्रतिष्ठित सरयूपारी ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के कारण बचपन से ही उन्हें संस्कृत और प्राचीन भारतीय संस्कृति की शिक्षा प्राप्त हुई। यद्यपि उनकी औपचारिक शिक्षा गाँव से कुछ दूर स्थित प्राइमरी स्कूल, रायपुरा (रपुरा) से आरम्भ हुई जहाँ उनके चाचा बाँकेबिहारी भी अध्यापक थे। 1920 में मिडिल स्कूल पास करने के साथ उन्हें उर्दू सीखने का अवसर भी प्राप्त हुआ। 1921 में इण्टरमीडिएट परीक्षा पास करने के पश्चात् वे संस्कृत में गहन शिक्षा हेतु काशी संस्कृत महाविद्यालय चले गए और उन्होंने समय के साथ मध्यमा और शास्त्री की उपाधि प्राप्त की।
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