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Bharitya Sanskriti Aur Itihas Ki Samjh
इतिहास की परिभाषाएँ भी इतिहासकारों की तरह अनेक हैं। किंतु इन परिभाषाओं में एक बात सामान्य रूप से स्पष्ट होती है कि इतिहास और कुछ नहीं बल्कि मानव के विकास का ही क्रमबद्ध अध्ययन है। इस दृष्टिकोण से यह मानव सभ्यता के विकास का क्रमबद्ध अध्ययन ही है! किस ऐतिहासिक काल और चरण में मानव विकास की प्रगति कितनी हुई थी उसका मापन या मूल्यांकन पूर्व काल की सांस्कृतिक विरासत और उस काल की सांस्कृतिक उपलब्धि से किया जाता है। अतः इतिहास को समझने में सांस्कृतिक अध्ययन की आवश्यकता तो क्या अपरिहार्यता होती है। बाकी विद्वान तो मानव ने जो किया अथवा अर्जित किया बस उसी के लेखा-जोखा तक अपने विवरण और विश्लेषण को सीमित किए रहे-बस वाल्टेयर ही एक अपवाद था! उसका अभिमत था कि सिर्फ जो मानव ने किया वही इतिहास का विषय नहीं है, अपितु जो कुछ उसने सोचा या विचार किया वह भी इतिहास का विषय है। बस यहीं से इतिहास या सभ्यता के विकास को समझने के लिए सांस्कृतिक उपलब्धियाँ और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो गईं ! मानव के सोच या विचार की अभिव्यक्ति तीनों आयामों में होती है। जब यह एक आयामीय हो तब यह धर्म, दर्शन और साहित्य में वर्णित होती है; द्वि-आयामी अभिव्यक्ति हम चित्रकला में और त्रि-आयामी अभिव्यक्ति का चित्रण स्थापत्य और अथवा वास्तुकला में पाते हैं। ये अभिव्यक्तियाँ ही सभ्यता की प्रगति का सूचकांक होती हैं और इसी से हम सभ्यता के विकास को जांचते-परखते हैं। इसीलिए संस्कृति का अध्ययन मानवीय विकास की प्रगति या इतिहास के विश्लेषणात्मक अध्ययन के लिए आवश्यक होता है। इतिहास में न तो सरलीकरण सम्भव है और ना ही सामान्यीकरण और यहीं यह विज्ञान से सर्वथा पृथक् स्वरूप
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