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Bhikharini
ठाकुर साहब तीन दिन तक वकील साहब के यहाँ रहे। रामनाथ ने उनकी बड़ी खातिर की, उन्हें भली-भाँति कानपुर की सैर कराई। तीसरे दिन ठाकुर साहब ने वकील साहब से कहा- अब मुझे आज्ञा दीजिए तो चलें गाँव छोडे कई दिन हो गये, घर-द्वार अकेला है। वकील साहब ने कहा- मैं कैसे कहूं। जैसी आपकी इच्छा, परन्तु आज क्या जाइयेगा-कल का दिन अच्छा है। जाइये। रामनाथ भी बोल उठे-हाँ, ठाकुर साहब, कल जाइयेगा-आज और ठहर ठाकुर साहब वह तो एक ही बात है, जैसे आज तैसे कल। रामनाथ-जब एक ही बात है तो कल ही चले जाइयेगा। ठाकुर साहब-अच्छी बात है, जैसा आपका हुक्म होगा वैसा करना पड़ेगा, कल ही सही। ठाकुर साहब के प्रस्थान का दिन नियत हो जाने पर बाबू रामनाथ को बड़ी बेचैनी हुई-बेचैनी केवल यह सोचकर हुई कि अब जस्सो चली जायेगी, सदैव के लिए चली जायेगी। कदाचित् अब इस जीवन में उससे फिर भेंट न हो! बाबू रामनाथ का चित्त बड़ा दुखी हो गया। उस दिन उन्होंने भोजन नहीं किया। पूछने पर 'इच्छा नहीं है' यह बहाना कर दिया। वह दिन भर एकान्त में पड़े आकाश पाताल की सोचते रहे। वह अपने हृदय से बातें करने लगे- 'तुमने ही तो यह दिन उपस्थित किया; तुम्हारी हार्दिक इच्छा यह थी कि जस्सो किसी तरह आँखों के सामने से टल जाए। सो, अर्थ वही हो रहा है। हाँ ठीक, यह मेरी इच्छा थी; पर उस समय यह नहीं मालूम था कि उसके टलने का अवसर आने पर हृदय इतना विचलित होगा, इतना अधीर होगा। उफ! मालूम होता है, जैसे कोई कलेजा निकाले लिये जा रहा है। मुझे क्या हो गया है, मैं उसके लिए क्यों इतना अधीर हूँ। वह मेरी कौन है? मेरा उसका क्या नाता? वह अपने पिता, अपने बाबा-दादी के साथ अपने घर जा रही है-इसमें मेरे बाप का क्या जोर है? नहीं, ऐसा न होना चाहिए! इससे तो वह अनाथ ही होती तो अच्छा था
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