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Bhojpuri Ke Dharohar : Bhikhari Thakur
भिखारी ठाकुर भोजपुरी समाज और साहित्य की अनन्य विभूति हैं। कबीर की तरह भिखारी ठाकुर भी प्रचलित अर्थों में भले ही 'अनपढ़' थे, पर उनके पास ऐसी दृष्टि, बोध, रचनात्मक क्षमता थी जिनकी बदौलत उन्होंने जो कुछ सिरजा, उसका महत्व असंदिग्ध है। यह देखना अत्यंत सुखद है कि अब भिखारी ठाकुर और उनके कृतित्व की चर्चा पूरे भारत में हो रही है। उनके अवदान को व्यापक सन्दर्भों में देखने समझने के प्रयासों में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इसके बावजूद, भिखारी ठाकुर पर कोई प्रामाणिक पुस्तक सहज सुलभ नहीं है। यह अभाव ही इस पुस्तक के लिए प्रेरणा बना कि भिखारी ठाकुर पर एक प्रामाणिक पुस्तक तैयार की जाए। इस पुस्तक में प्रयास किया गया है कि भिखारी ठाकुर के व्यक्तित्व और कृतित्व की मुकम्मल तस्वीर पेश हो सके। यह तो स्पष्ट है कि उनके कई आयाम हैं। गीतकार, नाटककार, समाज सुधारक, भक्त कवि, यह सब मिलकर बनता है भिखारी ठाकुर का व्यक्तित्व। वे आज एक नाटककार और रचनाकार से आगे बढ़ कर भोजपुरी समाज और साहित्य के कृती प्रतीक के रूप में मान्य हैं। लेकिन यह राहुल सांकृत्यायन थे जिन्होंने भिखारी ठाकुर के महत्व को सबसे पहले समझा था। आजादी के पहले, भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के अपने भाषण में उन्होंने भिखारी ठाकुर के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने भिखारी ठाकुर की सर्जनात्मक शक्ति को सबके सामने रखा। यह बड़ा साहस का कार्य था। उन्होंने कहा है, भिखारी ठाकुर की बात पाठक-श्रोता-दर्शक के मर्म को छूती है। प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक उदयनारायण तिवारी ने भी भिखारी ठाकुर को मान्यता दी। बद्री नारायण तिवारी ने भिखारी ठाकुर के नाटकों में वर्णित समाज के सुख दुख का वर्णन किया है। अंग्रेजी के उनके लेख का अनुवाद सुरेश कुमार मिश्र ने किया है। बिदेसिया एक शैली है या परंपरा, यह बहस का विषय रहा है।
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