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Devrani Jethani Ki Kahani
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के भारत का राजनीतिक परिदृश्य जटिल और परस्पर विरोधी तत्त्वों से मिल कर बना था। समकालीन रचनाकारों की वैचारिकता के निर्माण में भाषिक, साम्प्रदायिक विमर्श और पितृसत्ता की भूमिका थी। वे सुधारोन्मुख दीखने के साथ-साथ औपनिवेशिक प्रभुवर्ग के हित-विरोधी भी नहीं दिखना चाहते थे। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जिस गद्य का निर्माण हो रहा था, वह उनके इस 'एजेंडे' की पूर्ति में सहायक बना। उपन्यास-लेखन के प्रारम्भिक दौर में हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं के लेखक अपने-अपने समुदाय के भीतर स्त्रियों की दशा में सुधार की चिंता करते दिखने लगे। ब्रिटिश उच्चाधिकारियों की संस्तुति-प्रशस्ति और पुरस्कारों ने ऐसे गद्य-लेखन को प्रश्रय दिया जो उपन्यास के कलेवर में आचरण-संहिताएँ थीं। इस संदर्भ में निम्नलिखित स्थापना महत्त्वपूर्ण है- उपन्यास लेखन के प्रारम्भिक दौर में लिखी रचनाओं को न तो पूरी तरह पश्चिम से प्रभावित माना जाना चाहिए, न ही भारतीय आख्यान परम्परा से पूरी तरह विच्छिन्न। इन पाठों को भारतीय सांस्कृतिक विधाओं के सम्मिलन और टकराहटों के प्रमाण के रूप में देखा जाना चाहिए। इनका विश्लेषण मनुष्य, विशेषकर स्त्री आचरण-संहिताओं की दृष्टि से किया जाना चाहिए।
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