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Dojakh ki aag tatha any kahaniyan
कहानी आँखों में आँसू से बाबू आनन्दशंकर की विभूति देखकर कानपुर विस्मित था, वहाँ का व्यापारिक जगत् स्तब्ध। आनन्दशंकर के पिता श्री रामशंकरजी जब मरने लगे तब उनके पास रुपये ये ज़रूर, पर उनकी संख्या कई दर्जन तौ से अधिक न थी। रामशंकरजी तद्भुत की तन्तान थे। उनके खानदान का नाम, तदियों ते, धनिकों में लिया जाता था। त्वयं उनके पिता लखपति थे। पर रामशंकर धनोपार्जिनी शक्ति ते वचित थे। उन्हें रुपये फूंकने में जो तुख मिलता था, वह संचित करने में नहीं। यही कारण था जो वह अपने पुत्र आनन्दशंकर के भविष्य के लिए कुछ छोड़ न सके। आनन्दशंकर कर्मण्य थे, परिश्रमी थे, संयमी थे और थे संग्रही। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उत्साह उनमें कूट-कूटकर भरा था। थकना तो वह जानते ही न थे। इन्हीं तद्गुणों की कृपा से, पिता की मृत्यु के दस वर्ष बाद ही, उन्होंने अपने कुत्त की प्रतिष्ठा, सम्पत्ति ज्यों-की-त्यों-बल्कि पहले से भी अधिक कर ली। दस वर्ष की भीषण तपस्या, अनवरत श्रम के बाद सांसारिक विभूति उनके ऊपर प्रत्तन्न हुई। उनके मित्रों के शब्दों में- "लक्ष्मी पैर तोड़कर उनके घर में बैठ गई
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