- New product
Gajanan Muktibodh : Andhere Mein
गजानन माधव मुक्तिबोध आधुनिक हिन्दी साहित्य के सबसे चर्चित कवि रहे हैं और उनकी प्रतिनिधि काव्य-रचना है: 'अँधेरे में' । मुक्तिबोध की लम्बी कविताओं में सर्वाधिक चर्चित और विवादित यह कविता नवम्बर 1964 में 'कल्पना' पत्रिका में 'आशंका के द्वीप अँधेरे में' शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। बाद में 'चाँद का मुँह टेढ़ा है' में 'अँधेरे में' शीर्षक से संकलित-प्रकाशित हुई। मुक्तिबोध कठिन समय के जटिल कवि हैं। कैंटेसी उनकी रचना-प्रक्रिया का अभिन्न अंग है। प्रस्तुत कविता में समकालीन आधुनिक समाज और मनुष्यता का भयावह यथार्थ अनेक रूपों में फैंटेसी के मार्फत अभिव्यक्त हुआ है। उस भयावह यथार्थ का विभत्स रूप आज हमारे समाज के सामने फैला हुआ है। इस प्रकार 'अँधेरे में' एक कालजयी और असमाप्त कविता है। यही कारण है लम्बे अरसे से 'अँधेरे में' अपनी संरचना, संप्रेषणीयता और अपने प्रतिपाद्य के कारण पाठकों को आकर्षित करती आ रही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस लम्बी कविता से गुजरे बिना 'मुक्तिबोध-साहित्य-अध्ययन' पूरा नहीं होता।
You might also like
No Reviews found.