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Haiku Tarang
हाइकु वास्तव में एक बहुत ही सुंदर विधा है। यह जितनी सरल और सहज लगती है उतनी है नहीं। हाइकु मूल रूप से जापानी कविता है। हाइकु का जन्म जापानी संस्कृति की परंपरा, जापानी जनमानस और सौंदर्य चेतना में हुआ और वहीं पला है। हाइकु में अनेक विचार धाराएं मिलती हैं- जैसे बौद्ध धर्म, चीनी दर्शन, और प्राच्य संस्कृति। यह भी कहा जा सकता है कि हाइकु में इन सब विचार धाराओं की (देखने को) झांकी मिलती है या हाइकु इन सब का दर्पण है। हाइकु को काव्य विधा के रूप में बाशो (1644-1694) ने प्रतिष्ठा प्रदान की। हाइकु मात्सुओ बाशो के हाथों संवरकर 17वीं शता. जीवन के दर्शन से जुड़कर जापानी कविता की युगधारा के रूप में प्रस्फुटित हुआ। आज हाइकु जापानी साहित्य की सीमाओं को लांघकर विश्व साहित्य की निधि बन चुका है। आज इंटरनेट के युग में कई ऑनलाइन पत्रिकाओं के साथ हाइकु की 'हाइकु मंजुषा', 'हाइकु लैब' और अन्य पत्रिकाएं इस होड़ में हैं। इन पत्रिकाओं की मैं भी सदस्य हूं। हाइकु लैब की मीनू खरे जी समयानुसार त्योहारों, पात्र विशेष, अवसर विशेष आदि पर विषय रखती हैं जिन पर हम अपनी अभिव्यक्ति प्रस्तुत करते हैं। मीनू जी का एक हाइकु-खोयी गौरैय्या / ढूंढ-ढूंढ़ आंगन / कंक्रीट वन । पर्यावरण और प्रकृति के प्रति लता सुमंत कहती हैं- गौरैया आ तू ना संभले अब तो / डोले ये नैया। सरला भंसाली मजदूरों की हिम्मत की दाद देते हुए कहती हैं-हूं मजदूर / हिम्मत भरपूर / न मजबूर। लता सुमंत के अनुसार - समझ लेगा / कीमत जिंदगी की होगी सहज। मगर आज इंटरनेट के जमाने में हर कार्य जितना सहज है आपस में मिलना मुश्किल-दोस्त बहुत / इंटरनेट पर / पुकारूं कैसे ?
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