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Hawaoin Ke Nisan
अमृता की काव्य कृति 'हवाओं के निशान' की पाण्डुलिपि से गुजरते हुए मुझे ऋग्वैदिक ऋषि का स्मरण हो आया जहाँ वह प्रार्थना करते हैं- 'ॐ वाक् में मनसि प्रतिष्ठिता। मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम्। आविः मे आवीः एघि। (हे परमात्मन् !) मेरा वाक् इन्द्रिय मन में स्थित हो जाय और मन वाक् इन्द्रिय में। हे प्रकाश स्वरूप मेरे लिए तुम प्रकट हो, यह प्रकाश स्वरूप सत्य और ऋत का आत्म संवादी है जिसकी जन संवादिता की प्रतीति उद्घोषित करती है- (पश्य देवस्य काव्यम् न मर्मान जीर्यति)। इसमें चिर नवीनता की अवधारणा भी अनुस्यूत है और विस्तृति की मूलकारिका की अवस्थिति भी। सर्जनात्मक दृष्टि से परम सत्य की अभिव्यक्ति शब्द ब्रह्म है जो अन्तःस्फूर्त प्रेरणामय अनुभूति के क्षण में प्राज्ञ जनों के सम्मुख अपने को प्रकट करता है उनके शब्द कभी भी विभ्रान्त नहीं होते उनके शब्दों का अनुसरण अर्थ करता है। सब तरह के दृश्य पदार्थ कल्पना अथवा विचारों या भावों की प्रतिच्छाया या प्रतिबिम्ब शब्द है।