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Hindi Upanyas Ka Stri Paksh
साहित्य और समाज का रिश्ता द्वंद्वात्मक होता है। जिस तरह समाज के बिना साहित्य की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी तरह साहित्य के बिना समाज की कल्पना भी असंभव है। साहित्य के माध्यम से ही हम समाज के समस्त सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक गतिविधियों, उसके निर्माण की प्रक्रियाओं और अंतर्विरोधों को समझ सकते हैं। इसी तरह हम स्त्री-पुरुष के संबंधों, मूल्यबोध, सामाजिक परम्पराएँ, संवेदनाएँ और यथार्थ जीवन की चुनौतियों को समझ सकते हैं क्योंकि सामाजिक जीवन में स्त्री और पुरुष दोनों की अवस्था अलग-अलग है। यह असमान और असंतुलित है। मानव सभ्यता के विकास-क्रम से ही कालांतर में मानव-जीवन को संचालित करने वाले संस्थान, मूल्य, नीति-नियम और पैमाने सबकुछ पुरुष केन्द्रित हो गये और स्त्री की इयत्ता का लोप हो गया। पुरुष जीवन-जगत का पर्याय बन गया और स्त्री केवल प्रकृति की पर्याय बनकर रह गयी। स्त्री की पहचान केवल उसके शरीर तक ही सिमट कर रह गया किन्तु यह भी स्त्री का स्वायत्त नहीं था बल्कि यह भी पुरुष का था। लिंगभेदीय असमानता, सामाजिक कुरीतियाँ, उपेक्षित व्यवहार, पितृसत्तात्मक मान्यताओं को मानने की बाध्यता, सामाजिक सेंसरशिप, स्त्री के अन्दर का भय और द्वंद्व इत्यादि के कारण स्त्री की स्थिति हाशिये पर पहुँच गयी या निष्क्रिय रही। इन सबके सम्मिलित प्रभाव स्वरुप स्त्री की अनेक समस्याओं का जन्म हुआ जिसकी साहित्यिक अभिव्यक्ति सभी भाषाओं और विधाओं में हुई। खासकर उपन्यासों में इसकी अभिव्यक्ति अन्य विधाओं की तुलना में अधिक सर्जनात्मक और संवेदनात्मक रूप में हुई।
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