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Hindu Sanskriti Aur Sattavadi Rajniti
हिन्दू धर्म सत्य की खोज करने वाली प्रक्रिया है। सत्य का प्रत्येक साधन हिन्दू धर्म में पवित्र माना जाता है। इसलिए सत्य का अन्वेषण किसी भी मार्ग, किसी भी रूप से आए, हिन्दू धर्म में उसके आए हुए रूप को लेकर कमी संदेह का भाव नहीं रहा है और न कभी भविष्य में होगा। धर्म धारण करने की शक्ति का भाव है। धर्म का कार्य है समाज में सत्य, प्रेम, समानता, न्याय और समरसता का वातावरण बना रहे, सौंदर्य धारण की शक्ति बनी रहे, यही कार्य एक सच्चे धर्म का होता है। धर्म मानव समाज में विषमता की बजाय समरसता कैसे हो, आदि के बारे में विचार करता है। लाल मानते हैं कि धर्म में आवेश और भावुकता तो 'रिलिजन' का चरित्र है, धर्म का नहीं। हिन्दू धर्म को मानने वाला समाज और मनुष्य केवल पढ़ने-लिखने से ही संतोष नहीं करता बल्कि वह उसके प्रति स्वानुभूति भी रखता है। हिन्दू धर्म एक जीवंत धर्म है जो कभी नष्ट नहीं हो सकता। समाज में उत्पन्न जाति, आचार-विचार, रहन-सहन, खान-पान, व्यवसाय, परम्परा, व्यवहार आदि बदल सकते हैं, लेकिन हिन्दू धर्म अपने स्थान पर अडिग रहेगा। कम-से-कम भारत की जन्मभूमि पर हिन्दू धर्म कभी नहीं मरेगा; अब तो वैश्विक परिदृश्य में भी हिन्दू धर्म की स्वीकार्यता में उत्तरोत्तर वृद्धि देखने को मिल रही है। बीच के वर्षों में हिन्दू समाज अवश्य थोड़ा सुषुप्त अवस्था में चला गया था। लेकिन आज अपने संस्कार, अपने मूल्य, अपनी खोयी हुई संस्कृति को पुनः जीवित करने के उद्देश्य से उठ खड़ा हुआ है। हिन्दू धर्म के नष्ट न होने के कारणों में प्रमुख कारण एक यह भी है कि वह अपनी परम्परागत जड़ों से जुड़ा हुआ है। अपने पूर्वजों की संस्कारित परम्परा रूपी विचार धरोहर को सहेजकर रखा है। उसका ख्याल रखता है। जबकि विश्व-परिदृश्य पर ध्यान दिया जाए तो मालूम चलता है कि बहुत से ऐसे देश नष्ट हो गए; जिन्होंने अपने पूर्वजों के विचारों, उनके संस्कारों, अपनी संस्कृति,
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