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Ibbar Rabbi :Kavita Samgra
दूलाई 1969-इस दिन अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री चांद पर टहल रहे थे। मनुष्य का करोड़ों वर्ष पुराना सपना सच हो रहा था। विरही लोगों का प्यारा सहारा, रातभर उनको, रुलाने जलाने वाला चांद आज मनुष्य के पाँवों के नीचे था। अंतरिक्ष यात्राओं की शुरुआत सोवियत संघ ने की थी। गागारिन और लाइका की अंतरिक्ष यात्राओं के बाद रूस पीछे हट गया। बाद में आगे आया अमेरिका चांद पर पहुंच गया। यह ब्रह्मांड और ईश्वर पर मनुष्य का 'भीषण सुंदर' पदाघात था। अजमेर से अपना यार रमेश उपाध्याय बरसों बाद दिल्ली आया था। 'टी हाउस' में चंद्र विजय की चर्चा थी। यहीं मिला र. उ. पुराने चावल की तरह पुरानी यारी थी। गिले-शिकवे हुए। मैं तब गाजियाबाद में रहता था। नौकरी के साथ अंग्रेजी में एम.ए. की पढ़ाई कर रहा था। शाम को दोनों रेल से गाजियाबाद को रवाना हुए। खिड़की में चांद दिख रहा था। हम लगातार उसे घूर रहे थे। ब्रह्मांड विजय पर आह्लादित मानो मैं स्वयं चांद पर चल रहा था। वह दिन और वह क्षण तो इतिहास का भी पिता था। हमें पददलित चांद की दुर्दशा पर दया भी आ रही थी। उसका सारा सौंदर्य, सारा रहस्य, सारे मुलम्मे छूट गये थे। वह नंगा हो गया था। वह हमारी मुट्ठी में था। र. उ. मेरी कविता पर बात कर रहा था। मेरा कोई संकलन नहीं था। कविताएं पत्रिकाओं में इधर उधर बिखरी पड़ी थीं। वह संकलन की बात ही नहीं कर रहा था, बल्कि उसे छापने को भी तैयार था। नेकी और पूछ पूछ। मैं सोच रहा था कि उतनी कम कविताओं का संकलन क्या बनेगा! मेरे कमरे पर पहुंच कर कविताओं का पाठ हुआ। फिर उन्हें छापने की योजना बनी। हम घनघोर प्रयोगधर्मी थे।
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