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Kabir Bani
कवीर के साहित्य में मौजूद रहस्यवाद की व्याख्या दो विपरीत ध्रुवों पर होती रही है। कबीर के आलोचक और प्रशंसक दोनों ही रहस्यवाद को अपना हथियार बनाते हैं। ऐसे में श्रद्धा सिंह कवीर के अध्यात्मेतर रहस्यवाद की पड़ताल करती हैं। वे रहस्यवाद के भीतर से स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के भाव-बोध का उत्खनन करती हैं तथा सहज की सहजता का संधान करती हैं। कबीर बानी की इस यात्रा में वे पूर्व आचार्यों की मान्यताओं में मौजूद विसंगतियों का प्रतिकार भी करती हैं। वे आचार्य रामचंद्र शुक्ल के कबीर संबंधी विवेचन को एकांगी और अनुदार कहकर ही नहीं रुक जातीं, बल्कि सम्यक् मूल्यांकन की दिशा भी बताती हैं। इसी तरह वे हजारीप्रसाद द्विवेदी के मत की परीक्षा करती हैं। रमैनी की रचना के बारे में वे द्विवेदी जी के इस अनुमान कि 'तुलसीदास के रामचरितमानस की प्रसिद्धि के बाद कबीरपंथियों ने दोहा, चौपाई शैली में रमैनी जोड़ दी होगी' का प्रत्याख्यान ही नहीं करतीं हैं बल्कि अपने निर्णय को तथ्यात्मक आधार पर पुष्ट करतीं हैं। खास बात यह है कि प्रो. श्रद्धा सिंह कबीर मीमांसा में साखी, सबद और रमैनी-तीनों के टेक्स्ट को ध्यान में रखती हैं और बानियों के बीच से कबीर के दर्शन का साक्षात् करती हैं। नाना प्रकार की अस्मिताओं के विमर्श और तरह-तरह की वैचारिकी के आग्रह में कबीर बानी की आवाज कहीं खो जाया करती है, इसलिए श्रद्धा सिंह की पाठ केंद्रियता भली लगती है। - सदानंद शाही
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