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Kahaniyan Purano Ki

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2017
978-81-90488-66-2

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कुछ समय तक तो कौरवों और पांडवों के बीच शान्ति रही। पर कौरवों को अब भी चैन नहीं था। वे अब भी पांडवों से ईर्ष्या करते थे और, किसी न किसी तरह, उनका राज्य हड़प लेना चाहते थे। पांडवों में युधिष्ठिर को चौसर खेलने का बहुत शौक था। बस उनका यही एक व्यसन था। कौरव भली-भांति जानते थे कि युधिष्ठिर चौसर खेलने के निमंत्रण को कभी अस्वीकार नहीं करेंगे। और हुआ भी यही। उन्होंने युधिष्ठिर को निमंत्रण भेजा और वह मान गये। कौरवों का मामा शकुनि बहुत दुष्ट था। उसने चालाकी से गोटों में कुछ ऐसा हेर फेर कर दिया कि युधिष्ठिर सारी बाज़ियां हार गये। एक-एक करके वे अपना सब कुछ दांव पर लगाते गये और हारते गये। अन्त में उन्हें अपने राज्य से भी हाथ धोना पड़ा। यहीं नहीं शर्त के अनुसार, पांडवों को बारह वर्ष तक वनवास करना था। थे। पांचों पांडव द्रौपदी के साथ वनवास करने लगे। वन में भी वे प्रसन्न रहते एक दिन की बात है। मौसम बड़ा सुहावना था। ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी। हवा के साथ-साथ किसी फूल की सुगन्ध भी वन में फैल रही थी। सुगन्ध इतनी मोहक और इतनी अद्भुत थी कि द्रौपदी ने तुरन्त पूछताछ कि वह किस फूल की सुगन्ध है। जब उनको मालूम हुआ कि वह सुगन्ध एक बहुत दुर्लभफूल की है तो उनका मन उस फूल को पाने के लिए मचल उठा। लेकिन ऐसी दुर्लभ चीज़ को लाये कौन ! भीम के सिवाय इस काम को और कोई नहीं कर सकता था। उन्होंने भीम से फूल लाने की बात कही। भीम एक फूल के लिए अपना समय नहीं बर्बाद करना चाहते थे। उनको मालूम भी नहीं था कि फूल कहां उगता है

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