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Kannad ki Pratinidhi Kahaniyen
पिछले चालीस वर्षों में कन्नड में कहानियों का क्षेत्र आगे की ओर अग्रसर होता आ रहा है । कहानियाँµये रूप ही प्रमुख है, ऐसा कहा जा सकता है । उपन्यास से कहानी ने ज्यादा प्रचुर और विविधता के रूप में राज किया है । कन्नड कहानी सफर के चार पड़ाव हैं-नवोदय धारा, प्रगतिशील धारा, नव्य धारा और नव्योत्तर धारा । पाश्चात्य साहित्य के प्रभाव से कहानियाँ एक विशिष्ट प्रकार के रूप में कन्नड में उभर कर आई हैं । 1900 में पंजे मंगेशराय जी की दो कहानियाँ छप गर्इं । एम– एन– कामत, केरूरु वासुदेवाचार्य जी ने भी आरम्भ में कहानियाँ लिखीं । मगर कहानी के लिए एक आकार देकर उसे एक गंभीर और चिंतन–माध्यम बनाने वाले हैं । ‘श्रीनिवास’ यानी मास्ति वेंकटेश अय्यंगार । मास्ति जी का स्थान कन्नड कहानी क्षेत्र में सबसे पहले आता है । ये कन्नड कहानी विधा के शिखर और प्रवर्तक लेखक हैं । मास्ति जी के समकालीन लेखकों में नवरत्न रामराय जी, ए– आर– कृष्णशास्त्री जी, शिवराम कारन्त जी, देवुडु, सी– के– वेंकटरामय्या, आनंदकंदा, नरसिंह शास्त्री, रं– श्री– मुगली आदि कहानीकारों को भी याद कर लेना चाहिए ।
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