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Kathputli
कठपुतली' की कहानी लाहौर से आरम्भ होती है जिसकी साहित्यिक और सांस्कृतिक जलवायु में मैंने अनेक वर्ष बिताये। जब यह उपन्यास लिखना आरम्भ किया गया तो मुझे लगा कि लाहौर स्वयं मेरे हाथ में कलम देकर मुझ से अपनी गाथा लिखाने बैठ गया जैसे गाँव का कोई बुजुर्ग किसी से अपनी चिट्ठी लिखवाता है। उपन्यास के अनेक पात्रों में दीपाली का विशिष्ट स्थान है जिसके सहयोग से सुनील को सचमुच एक नया जीवन प्राप्त हुआ। जीवन के समीप होते हुए भी सुनील अब तक उसकी सतह पर ही रहा था। दीपाली ने उसे उन गहराइयों से परिचित कराया जिनमें उतरे बिना एक सच्चे कलाकार की कला आगे नहीं बढ़ सकती। दीपाली का संकेत पाकर ही सुनील ने भागती हुई ज़िन्दगी का आँचल एक दिन अपने हाथ में थाम लिया था और वह भी उसके साथ ही दौड़ने लगा था। 'कठपुतली' का प्रमुख प्रसंग यही है कि इन्सान एक है, उसकी समस्याएँ एक हैं और देश-देश की सीमाएँ भी एक इन्सान को दूसरे इन्सान से अलग नहीं कर सकतीं। यहाँ उस इन्सान की झलक प्रस्तुत की गई है जो अत्याचार और बर्बरता में भी आशा का आँचल नहीं छोड़ता, उस इन्सान की दास्तान है जो विनाश के संकटमय क्षणों में भी उज्ज्वल भविष्य की बाट जोहता है और उस इन्सान का चरित्र अर्जुनसिंह में मिलता है जो जीवन के व्यंग्य और परिहास के संगम पर खड़ा है। विकास की अनेक मंज़िलों से गुज़रता हुआ सुनील अन्तर्दृष्टि और अनुभव के सहारे युग-सत्य को रंगमंच पर रूपायित करने की चिन्ता में वर्षों की साधना के बाद भी यही समझता है कि परिस्थितियाँ उसे नचाती रही हैं और वह कोई ठोस कार्य नहीं कर सका। लेकिन उसकी इस वेदना और निराशा से आशा की किरन फूटती है। - देवेन्द्र सत्यार्थी
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