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Kuch Khadi ki : kuch khaki ki

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2026
9789348650313

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तीन दशकों से कुछ अधिक समय मैंने खाकी कपड़ों में विताया है। पुलिस की नौकरी में मुझे जो अनुभव हासिल हुए वे किसी अन्य पेशे में नहीं मिल सकते थे। उन दिनों जिन लोगों से मेरा साबक्रा पड़ा उनमें चोर, उचक्के, लफ्रेंगे, भले मानुष, गरीब, अमीर हर तरह के लोग थे। इन्हीं में से कुछ लोग ऐसे भी थे जो खादी पहनते थे। ये भारत भाग्य विधाता थे। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि भारत में राजनीति में भाग लेने वाले खादी के कपड़ों में रहते हैं। दुनिया में शायद ही कोई देश होगा जहाँ राजनेताओं और नौकरशाहों की पोशाकें अलग-अलग होती हों। इसका मुख्य कारण तो यह है कि शुरुआती दौर के ज्यादातर नेता स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वालों में से थे और वे देश की गरीब जनता से निकटता दिखाने के लिए उनके जैसा दिखना चाहते थे। इस लड़ाई का मुख्य नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया था और वे तो सिर्फ़ एक वस्त्र धारण करते थे। उन्हीं के चलते कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए हाथ से बुने कपड़े अनिवार्य किए गए। इनके बरक्स नौकरशाही के छोटे बड़े पुर्जे यूरोपियन पोशाक पहनते थे। वही परंपरा आज भी बरकरार है-आमतौर से एक नेता खद्दर पहनता है और यही उसकी पहली पहचान होती है। एक लोकतंत्र में सारे नीतिगत निर्णय जनता द्वारा चुना राजनैतिक नेतृत्व लेता है और पुलिस समेत तमाम संस्थायें इन निर्णयों को लागू करने की जिम्मेदारी उठाती हैं। दुर्भाग्य से आज़ादी के बाद शासक बने हमारे राजनैतिक नेतृत्व ने कभी भी पुलिस के उस चरित्र में बुनियादी बदलाव लाने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किए जिसे उसने विदेशी शासकों द्वारा 1860 के दशक में बनाये गये क़ानूनों के तहत हासिल किया था। यह उससे भी बड़ा दुर्भाग्य है कि आज़ादी की लड़ाई जिन आदशों से प्रेरित

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