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Mahayatra Gatha (4 Volume Set)
कोई भी नहीं जानता कि सृष्टि का प्रारम्भ कब हुआ। वैज्ञानिक निरन्तर प्रयत्नशील हैं। संसार में पेट भरने के अतिरिक्त मनुष्य का दूसरा काम इस समस्या को सुलझाना ही रहा है। किसी भविष्य में मनुष्य सम्भवतः इस रहस्य को भी खोज निकालेगा, यद्यपि आज इसको सोचने पर असम्भव सा ही लगता है। विकासवाद मनुष्य के इतिहास पर प्रकाश डालता है। वह जावा के पिथीकैथोपस को प्रथम मनुष्य मानता है। वह आदिम मनुष्य था। उसके बाद अन्य जातियों ने जन्म लिया, आईं और मिट गई। वह लाखों बरस की बात हुई। तब शायद इस धरती पर द्वीपों और महाद्वीपों का यह रूप भी नहीं था, जो आज हमें मिलता है। कोई कहता है कि तब लंका आस्ट्रेलिया और मैडागास्कर से जुड़ी हुई थी, हिमालय मैदान था, गंगा और सिन्ध का मैदान समुद्र में डूबा हुआ था। यह सब परिवर्तन उन्हीं मनुष्यों के सामने हुए। कई बार उन जातियों ने हिमयुग झेला, बाढ़ें झेलीं, और इस प्रकार वे नष्ट हो गई। फिर जीवित होकर मनुष्य दूसरी ही जाति के रूप में पृथ्वी पर चलने लगा। और इस बार भी उसमें अपूर्व शक्ति थी। वह निराश नहीं था। कहते हैं नीन्डरथैलियन तृतीय मनुष्य था। वह गुफाओं में रहता था। मुर्दों से डरता था। उसमें भय था, निश्चित भय नहीं, अनिश्चित और अज्ञात के प्रति भय। वहीं से जादू प्रारम्भ हुआ। परन्तु वह फिर लुप्त हो गया। फिर एक चौथा मनुष्य आया, वह भी लुप्त हो गया। उसके बाद पाँचवाँ मनुष्य क्रोमैनन आया। वह रूस के स्टेपीज से लेकर स्पेन तक फैला हुआ था। वह घोड़े पालता था। उन पर सवारी करता था, उनका मांस खाता था। पत्थर के हथियार, लकड़ी के हथियार उसकी रक्षा करते थे। वह गुफाओं में जंगली पशुओं के चित्र भी छोड़ गया है। वह भी किसी प्राकृतिक उत्पात, हलचल, या किसी हिमयुग में अपनी रक्षा न कर सकने के कारण लुप्त हो गया। और उसके बाद छठा मनुष्य पृथ्वी पर आया, जो कि होमोसैपियन कहलाया। हम छठे मनुष्य के ही वंशज हैं। इस होमोसैपियन जाति के मनुष्य का उदय कहीं एक ही स्थान पर नहीं हुआ। वह संसार के भिन्न-भिन्न स्थानों में सहस्रों वर्ष पहले से दिखाई देता है। होमोसैपियन जाति में विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में जन्म लेनेवाले मनुष्यों की आकृतियों में, उनके रंग में भी थोड़ा-थोड़ा फर्क हुआ, जो आज भी दिखाई देता है।