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Awadh Ke Gadar Ka Itihas
इतिहास लिखना, और सो भी सन् 57 के गदर का इतिहास, जिसे हमारे देशभक्तों ने 'स्वाधीनता का युद्ध' घोषित कर गौरवान्वित किया है, हमारे लिये सर्वथा अनधिकार चेष्टा है; हममें उसे लिखने का न तो विद्या-बल है, न बुद्धि-बल ही। यह जानते हुए भी हमने यह दुस्साहस जान-बूझकर किया है। इसका एक कारण है। हमने अपने बचपन में ग़दर की कथा बहुत सुनी ही नहीं है, हमारा जन्म-ग्राम बकसर उस ग़दर का एक लीला-क्षेत्र भी रहा है। उसके कारण वहाँ के ढौंढ़ियाखेरा का प्राचीन राज्य सदा के लिये नष्ट हो गया, और हमारे पितृव्य, जो वहाँ के राजदरबार के एक सम्मान प्राप्त राजवैद्य थे, निराश्रय हो गए। यही नहीं, हमारी एक चाची के पिता बादशाह वाजिदअली के कप्तान पंडित माधवसिंह मिश्र ने विद्रोह में भाग लिया, जिसके कारण हमारी चाची को अपने कुटुंबियों के साथ नेपाल की तराई के जंगलों में महीनों मारा-मारा फिरना पड़ा था। गदर-संबंधी उनकी भी बातें हमें प्रायः सुनने को मिलती थीं। और, गाँव के बड़े-बूढ़ों की गोष्ठी में तो अपने गाँव एवं वैसवाड़े के दूसरे स्थानों की घटनाओं की वार्ता तो प्रायः नित्य ही सुना करते थे। लड़कपन की सुनी हुई वे सब बातें नहीं भूलीं। यही नहीं, पढ़ने-लिखने के बाद ग़दर-संबंधी ब्योरेवार हाल जानने की उत्सुकता और भी बढ़ गई। फलतः हमने तत्संबंधी पुस्तकें मनोयोगपूर्वक पढ़ीं। उन सब पुस्तकों के पढ़ने से हमारे मन में यह धारणा घर कर गई कि ग़दर का सबसे अधिक ज़ोर एकमात्र अवध में ही रहा है, अतएव हिंदी में एक ऐसी पुस्तक लिखी जानी चाहिए, जिसमें अवध के ग़दर का विवरण क्रमपूर्वक आ जाए।
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