• New product

Mahila-Manoranjak Prashnawali

(0.00) 0 Review(s) 
2026
9789347602627

Select Book Type

Earn 6 reward points on purchase of this book.
In stock

इस समय भारतवर्ष में अनेक प्रकार के रीति-रिवाज रूढ़ियों के रूप में प्रचलित हो रहे हैं। हमारे पूर्वपुरुषों ने देश, काल और परिस्थिति के अनुसार जिन्हें उपयोगी समझकर प्रचलित किया था, आज वे विकृत रूप में पालन किये जा रहे हैं। हमारे देशवासियों में यह एक विशेषता है कि वे पुरानी बातों को बड़ी श्रद्धा और तत्परता से पालन करते हैं। पुरुष-समाज की अपेक्षा स्त्री-समाज के अन्तःकरण में यह बात विशेषतया सुदृढ़ हो गई है कि हर बात में पुरानी प्रथाओं का पालन करना ही परम धर्म है। इसी विचार को सम्मुख रखकर सद्गृहस्थों की स्त्रियाँ पुरानी रीतियों का पालन करती हैं। मैं इस बात की कदापि पक्षपातिनी नहीं हूँ कि पुरानी सब बातों या रीतियों को छोड़कर नवीन का ही अवलम्बन किया जाय। पर मैं इस पक्ष में तो अवश्य हूँ कि जिन रीतियों का पालन किया जाय, उनके कारण, महत्त्व और हानि-लाभ को पहले, समझ लिया जाय। इससे करनेवाले को सन्तोष होता है, उनकी विशेष उपयोगिता वह लाभ उठा सकता है और आवश्यकता पड़ने पर दूसरों को उनका महत्त्व समझा सकता है। आजकल गृहस्थों की स्त्रियाँ जिन अनेक रीति-रिवाजों का पालन करती हैं, वह केवल अन्धविश्वास के कारण ही। अनेक बार कई गृहदेवियों से यह पूछा गया कि "अमुक रूढ़ि का पालन आप क्यों करती हैं, अमुक क्रिया करने का क्या फल है, इससे क्या लाभ है, यह क्यों किया जाता है, इसे न करने से क्या हानि है इत्यादि"; परन्तु शोक के साथ लिखना पड़ता है कि सदा यही उत्तर मिला कि "हम इनका कुछ भी कारण नहीं जानतीं। बहुत दिनों से यह प्रथा चली आई है। इससे हम भी इसका पालन करती हैं, क्योंकि बड़ों की चाल को छोड़ना पाप है, इत्यादि।" यह उत्तर सुनकर मन में बड़ा असन्तोष हुआ। साथ ही यह विचार भी उत्पन्न हुआ कि इस समय की सब प्रचलित रूढ़ियों पर प्रश्नोत्तर के रूप में एक निबन्ध लिखकर किसी स्त्री-उपयोगी पत्रिका में छपवा दिया जाय। इसी विचार को कार्यरूप में परिणत

You might also like

Reviews

No Reviews found.