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Manoj Rupada : Chuni Hui Kahaniyan
बीते दो-ढाई दशकों में हिंदी कहानी का रंग-रूप कैसे बदला, इस सवाल के जवाब के लिए थोड़ा और इंतजार अपेक्षित है लेकिन उन अनमोल बदलावों को बुलंदी तक पहुंचाने में जिन मौजूदा कहानीकारों ने सबसे ज्यादा जोर लगाया, उनमें कथाकार मनोज रूपड़ा एक अनिवार्य नाम है। 'टॉवर ऑफ साइलेंस', 'खात्मा', 'आखिरी सीन', 'रद्दोबदल', 'दृश्य-अदृश्य' और 'बेबी संजना की मुस्कराहट' जैसी कई उम्दा कहानियों से हिंदी कहानी के पाठक को न्यारे स्वाद की लत लग गई। मनोज का उल्लेख आते ही पहली दृढ़ धारणा तैयार होती है कि उनकी ज्यादातर कहानियों का शैल्पिक रचाव परंपरागत ढर्रे से मेल नहीं खाता है। दूसरी सर्वसम्मति वाली मान्यता है कि उनका विषयगत चुनाव विरल है और तीसरा दावा यह है कि उनकी कहानी लिखने की विधि नायाब है। ऊपर जिक्र की गई कहानियां 'चुनी हुई कहानियाँ' में संकलित है। मनोज रूपड़ा की प्रतिष्ठा बहुधा लंबी कहानियां लिखने के कारण है। कहानी लंबी कहने/लिखने के लिए एक खास तरीके का कलात्मक सन्द्र चाहिए होता है। उनमें वह कलात्मक सब्र यथेष्ठ है। कहानी प्रारंभ या खत्म करने की हड़बड़ाहट इनकी लेखन में छटाक भर नहीं दिखाई पड़ती है। इक्कीसवीं सदी के कहानीकारों ने कहानी में जिस तरह से आधुनिक प्रवृत्तियों को घोल दिया है, वह आश्वस्तकारी है। उनकी कहानियों की वैचारिक प्रतिबद्धता गजब की है। कथा में कला और कला में विचार के अनोखे संगम की दर्शनीय झलक जिन्हें देखने का मन हो, मनोज रूपड़ा की कहानियों में प्रवेश करना चाहिए। कहानियों का दरवाजा खुला है, कुंडी खटकाने की गरज नहीं। जिस तेज गति से संसार बदला और बदलती दुनिया का जिस उमंग से बदलाव का जश्न मनाया गया, उसमें सीधे-सीधे यह दिख ही नहीं पाया कि एक
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