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Mend Par Baithi Saanjh

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2025
978-9347029318

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कविता की सार्थकता और कवि की सिद्धहस्तता दोनों उसके प्रखर युग-बोध और उसकी सफल अभिव्यक्ति से निर्धारित होती है। जो कविताएँ अपने परिवेश के यथार्थ, उसकी विसंगतियों, विद्रुपताओं और कठिनाइयों के द्वन्द्व को जीकर सच्ची अनुभूतिगत प्रामाणिकता के साथ कलमबद्ध होती हैं, वे समय के ललाट पर अपने चिह्न छोड़ देती हैं। बुन्देली धरती के कृषक परिवार में जन्मे 'हरि ओम' की कलम की स्याही उस बुन्देली धरती की दरारों से रिसते रक्त की लालिमा से भरी गई है। 'हरि ओम' बहुत कम आयु में उस धरती की पीड़ा, कृषक समाज की वेदना को कविता में उतारते हुए अपनी सशक्त लेखनी से हिंदी के कविता संसार में अपना पहला कदम रख रहे हैं। 'मेंड़ पर बैठी साँझ' हरि ओम का पहला काव्य संग्रह है, पर विचारों और भावों की परिपक्व अभिव्यक्ति मन में कौतूहल पैदा करती है। काव्य संग्रह में तीन तरह की कविताओं का संकलन है। 'मेंड़ पर बैठी साँझ' प्रकरण में बुन्देली धरती का यथार्थ है। आज तकनीकी गति इतनी तेज है कि उसका अनुमान भी कठिन है, मंगल पर पहुँचने की यात्रा में मानव-प्रतिबद्धता के साथ सम्बद्ध एक कविता 'अखबार का पहला पृष्ठ' आती है तो विकास के खोखलेपन का आभास देती है। अखबार के पहले पृष्ठ पर... वहीं लटका है एक आदमी / बैल के पगहे के सहारे / उसी नीम की डाल पर। उस आदमी के लटकते ही सारा विकास, समस्त मानवता उस पगहे के सहारे लटकती नजर आती है। 'चुनावी जुमले', 'वह कौन है?', 'विलायती सिल्क और पिता', 'शहर-चूल्हा और पेट' जैसी कविताएँ किसानों और श्रमिकों के संघर्ष और पीड़ा की मार्मिक और संवेदनशील अभिव्यक्ति हैं।

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