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Namvar Singh : Ek Sanchayan ( 2 vol. set)

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2026
9789348650405

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हिन्दी आलोचना व समीक्षाशास्त्र का एक अपरिहार्य अनिवार्य नाम है- 'नामवर सिंह'। उनकी सक्रिय उपस्थिति से आधुनिक हिन्दी साहित्य एक लम्बे समय से आलोकित रहा है। नामवर सिंह आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा के बाद आधुनिक युग के सर्वाधिक विवादास्पद, बहसतलब और बहुपठित आलोचक रहे हैं, जिन्हें अपने जीवन काल में ही एक 'जीवित किंवदन्ती बन जाने का गौरव प्राप्त हुआ। प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक साहित्य के मर्मज्ञ नामवर सिंह के आलोचक व्यक्तित्व की असाधारण विशेषता है- 'पाण्डित्य और सहृदयता, शोध और आलोचना, शास्त्र और लोक, भारतीय तथा विदेशी विचार प्रवृत्तियाँ, पूर्वी साम्यवादी तथा पश्चिमी स्वाधीन समीक्षाधाराओं, पुराने तथा नये ताहित्य में बराबर रुचियों का विरल सम्मिलन।" एक ओर उन्होंने परम्परित व रूढ़िवादी मान्यताओं तथा बोझिल शास्त्रीयता के प्रति क्रान्तिकारी उन्मेष जाग्रत किया, साहित्य को एक नयी पृष्ठभूमि दी; तो दूसरी ओर साहित्य में समग्रता पर जोर देकर समकालीन युग-चिन्तन को नया स्वरूप प्रदान किया, साहित्य को लोक से जोड़ा और लोक-सौन्दर्य को साहित्य में उतारा। 'सृजनात्मक आलोचना' के पक्षधर नामवर जी एक लोकप्रिय अध्यापक व घोषित मार्क्सवादी आलोचक थे। मार्क्सवादी विचारधारा से अनुप्राणित होने के बावजूद वे खुले-स्वतंत्र चेता रहे और जरूरत पड़ने पर उसे अतिक्रमित भी करते रहे। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि 'विचारधारा चाहे जो भी गाँधीवाद हो, हिन्दुत्व हो या मार्क्सवाद हो-लेखकीय सन्दर्भ में इससे उत्पन्न साहित्य की गुणवत्ता ही महत्त्वपूर्ण होगी।" वे लगातार संवाद करना चाहते थे, साहित्य के सरोकारों में सभी को साझीदार बनाना चाहते थे। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने असहमति को कभी बुरा नहीं माना, बल्कि वे असहमतियों को लेकर भी सकारात्मक बने रहे। उन्होंने विचारधारा के पार जाकर भी साहित्य से प्राप्त दृष्टिकोण और रचनाशीलता की नवीनता की बात की और उसके मूल्यबोध को प्रधानता दी। आलोचना का एक स्वतंत्र मार्ग तलाशने में उन्हें कई गम्भीर चुनौतियों, आरोपों, कुत्सित एवं संकीर्ण मनोवृत्तियों का जमकर

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