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Parsi Hindi Rangmanch
हिन्दी के विकास और प्रसार के लिए शिक्षा एवं समाज कल्याण मंत्रालय के तत्त्वावधान में पुस्तकों के प्रकाशन की विभिन्न योजनाएं कार्यान्वित की जा रही हैं। हिन्दी में अभी तक ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में पर्याप्त साहित्य उपलब्ध नहीं है, इसलिए ऐसे साहित्य के प्रकाशन को विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है। यह तो आवश्यक है ही कि ऐसी पुस्तकें उच्च कोटि की हों, किन्तु यह भी जरूरी है कि वे अधिक महंगी न हों ताकि सामान्य हिन्दी पाठक उन्हें खरीदकर पढ़ सकें। इन उद्देश्यों को सामने रखते हुए जो योजनाएं बनाई गई हैं, उनमें से एक योजना प्रकाशकों के सहयोग से पुस्तकें प्रकाशित करने की है। इस योजना के अधीन भारत सरकार प्रकाशित पुस्तकों की निश्चित संख्या में प्रतियां खरीद कर उन्हें मदद पहुंचाती है। प्रस्तुत पुस्तक इसी योजना के अन्तर्गत प्रकाशित की जा रही है। इसके कापी राइट इत्यादि की व्यवस्था प्रकाशक ने स्वयं की है तथा इसमें शिक्षा-मंत्रालय द्वारा स्वीकृत शब्दावली का प्रयोग किया गया है। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ से लगभग आधी शताब्दी तक समस्त उत्तर भारतीय जनता की इच्छा, आकांक्षा और चेतना को अभिव्यक्ति देने तथा उसके सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जागरण को मूर्त करनेवाले पारसी थियेटर के अनेक नामों से प्रचलित हिन्दी-उर्दू तथा अन्य उत्तर भारतीय भाषाओं के रंगमंच के विकास का इस पुस्तक में समग्र चित्र है। प्रचलित नाटक-परम्परा के हास और चलचित्र के आगमन से पूर्व इस पारसी रंगमंच का बोलबाला रहा है। किसी समय भारतीय जनमानस को पूर्णतः प्रभावित करनेवाले इस नाटक के हर पक्ष पर कितना कार्य हुआ है, इस सबका अध्ययन यहां दिया गया है जो अपने आपमें रोचक और मनोरंजक है। हमें विश्वास है कि शासन और प्रकाशकों के सहयोग से प्रकाशित साहित्य हिन्दी को समृद्ध बनाने में सहायक सिद्ध होगा और साथ ही इसके द्वारा ज्ञान-विज्ञान
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